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Thursday, August 29, 2019

मंदी मन की

प्रतीकात्मक तसवीर
सौजन्य : इन्टरनेट 

भारत में मंदी की बात मिडिया में जोरशोर से कब से होने लगी? जुलाई में खातावही में सुपर रिच टेक्स २५ प्रतिशत करने और कॉर्पोरेट टेक्स नहीं घटाने के निर्णय के बाद।

वैसे भी अमरिका और चीन के बीच चल रहे व्यापार युद्ध और वैश्विक मंदी के चलते भारत को थोडीबहोत तो असर होनेवाली ही थी, किन्तु एक मानसिकता भी होती है। एसे मोके का फायदा उठाकर 'मंदी है, मंदी है' एसा शोर मचाकर अपना मुनाफा यथावत रखने के लिए अपनी कंपनी से कर्मचारियों को निकालने की या उनकी सेलरी घटाने की कसरत होती है। यह एक संक्रमण जैसा होता है। देखादेखी में यह आगे बढता है।

कुछ कंपनियाँ (जैसे पार्ले जी) नोकरी में से निकालेंगे एसी हवा फैलाती है। जिसका एक उद्देश्य सरकार लाभ घोषित करे तो पाना होता है और दूसरा, कर्मचारी निकाले जाने के डर से पगार बढाने की बात न करे, मंदी के बहाने उसको यदि और कोई काम सोंपा जाये तो वह करें। कदाचित इन्हीं सब कारणों के चलते इन बडी मछलीओने शॅयर बाजार में भी मंदी बनाकर रखी है।

जहां तक ओटो मोबाइल की मंदी की बात विशेष रूप से की जा रही है, इस के पीछे दो कारण है। पीछले कुछ वर्षो से कार और टु व्हीलर लॉन उपलब्ध होने के कारण लोग अपने घर में प्रति सभ्य एक टु व्हीलर और प्रति फेमिली एक कार (यदि परिवार की कमाई अच्छी है तो दो कार) खरीदने लगे थे। लेकिन उसका कोई चरम बिंदु तो आनेवाला ही था। पेट्रोल-डीझल के बढते दाम और बढते ट्राफिक से कुछ लोग एसे भी होंगे जिन्होंने कार खरीदने की योजना टाल दी हो। तीसरा कुछ ही अमीरचंद एसे होंगे जो नई कार मार्केट में आने पर खरीद लेते होंगे।

दूसरा कारण, मोदी सरकार इलेक्ट्रिक वाहनों पर जोर दे रही है। इसके पीछे वैश्विक पर्यावरण में परिवर्तन है जिस में भारत नेतृत्व करे एसी संभावना है। पेट्रोलियम पर इस्लामिक देशों की दादागीरी समाप्त करके इस्लामिक आतंकवाद की शबपेटी की किल ठोकना भी है और इससे विदेशी मुद्रा बचाकर रूपिये को मजबूत करना भी हो सकता है।

अब जब कि ओटो मोबाइल के लिए वाहन प्रदूषण की डेडलाइन हटा दी गई है, सरकार ने अर्थतंत्र को प्रोत्साहन देने के लिए कुछ कदमों की घोषणा की है तो  आशा है कि मंदी मंदी की बूमाबूम कुछ हद तक घटेगी। वैश्विक मंदी का तो जो प्रभाव होगा, वो तो होगा ही।

मंदी का एक कारण पीछले वर्ष अच्छी बारिश न होना भी हो सकता है। इस वर्ष बहोत अच्छी बारिश हुई है तो आनेवाले महिनों में इसका असर दिखेगा।

अगर मंदी ही है तो लोगों की खरीदी क्यों अभी भी ज्यादा है। अभी मैं पूणे गया था। वहां  की मार्केट में अभी जन्माष्टमी के बाद भी बहोत भीड थी। अमदावाद हो या कोई और शहर, होटल, रेस्टोरन्ट या सस्ते खोराक की दुकान, ठेलेवाला, भीड तो रहती ही है। ओनलाइन खरीदी और ओनलाइन भोजन के आदेश में कोई कमी दिखती नहीं है। तो जो लोग मंदी की बूमाबूम कर रहे है वह व्यापारी कहीं ओनलाइन खरीदी की कंपनियों के चलते तो बूमाबूम नहीं कर रहे है ना? यह सोचने की आवश्यकता है। कदाचित बिजनेस मोडल तो नहीं बदल रहा? क्यों न एसे व्यापारी मिल के अपनी एमेझोन जैसी कंपनी न बनाये? सरकार को भी ओनलाइन कंपनियों पर कर डालने की आवश्यकता है।

और जहां तक भारत की अॉटो मोबाईल कंपनियां मंदी के नाम पर स्टिम्युलस पेकेज मांग रही है, मुख्य आर्थिक सलाहकार कृष्णमूर्ति सुब्रमण्यम ने ठीक ही कहा कि मुनाफा हो तो अपना, लेकिन नुकसान हो तो पूरे देश का यह मानसिकता सही नहीं है।

मैं तो यह कहना चाहूंगा कि पेकेज देना है तो उन कर्मचारियों को दीजिए जिनको यह बडी बडी कंपनियां अपनी जेब भरी की भरी रहे इसके लिए निकाल रही है। इस के कारण अब उनको दूसरी जगह भी कम वेतन में नौकरी मिलेगी। कंपनियां अपने सीइओ का वेतन क्यों नहीं कम करती? किसी कंपनी के सीएमडी ने मानवता को ध्यान में रखकर क्या यह घोषणा की कि वह अपना वेतन कम करेंगे जिससे सभी नहीं तो ना सही, कुछ कर्मचारियों की नौकरी तो बच जायेगी।

इस मानसिक मंदी के वातावरण में सरकार को दूध-सब्जी, चाय, हॅयर कटिंग सलून, स्कूल-कॉलेज, हॉस्पिटल जैसी आवश्यक सेवाओं के दाम भी कम करवाने चाहिए। मेडिक्लेम प्रिमियम भी घटाना चाहिए। इस मानसिक मंदी में सब से ज्यादा कोई पीडित होता है तो वह मध्यम वर्गीय व्यक्ति ही होता है क्योंकि उद्योगपतियों से राजनीतिक दलों को चंदा चाहिए इस लिए उनकी हंमेशां चलती है। गरीबों की मत बॅन्क है। उनके लिए सरकारी योजनाएं भी है। लेकिन मध्यम वर्गीय स्वावलंबी भी है और स्वाभिमानी भी। वह किसी के पास हाथ फैलाना नहीं चाहता, सिवाय कि उसके पास ओर कोई चारा न हो। 

Tuesday, August 6, 2019

विरोधियों को जीतनेवाली बहुभाषी, ज्ञाता तथा कार्यदक्ष सुषमाजी


स्मितसभर चहेरा, बहुभाषी (सम्स्कृत, हिन्दी, उर्दू, अंग्रेज़ी), ज्ञानी एसी भाजप नेत्री सुषमा स्वराज हमारे बीच नहीं रहीं। जातेजाते वह संतोष लेकर गई कि जीवनभर जिसकी प्रतीक्षा की वह धारा ३७० प्रधानमंत्री मोदी ने समाप्त कर दी।

अपनी कभी मधुर, कभी तीखी तो कभी व्यंग्यसभर वाणी से वह हर किसी का मन जीत लेती थी। तो विरोधियों का मुंह बंध भी करा सकती थी, किन्तु विरोधी से कटुता नहीं होती थी। अधिवक्ता होने के कारण अपनी बात तर्क व उदाहरण से प्रस्तुत करना कोई उनके अब विडियो देख सीखे। १९९६ या १९९७ में संसद में अविश्वास प्रस्ताव के समय उनका भाषण कौन भूला होगा?

सब से अल्प आयु में हरियाणा सरकार में मंत्री से लेकर दिल्ली की पहली महिला मुख्यमंत्री, संसदीय मंत्री, सूचना व प्रसारण मंत्री, लोक सभा में विपक्ष नेता और गत सरकार में विदेश मंत्री। उन्होंनें फिल्म जगत को विधिवत उद्योग का दरज्जा देकर काले धन और दाउद के चंगुल से निकालने का प्रयास किया। संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान को चारो खाने चित्त करा देनेवाला उनका भाषण, या इस्लामिक देशो के संगठन ओआईसी में जाकर उन्ही के बीच पाकिस्तान प्रेरित आतंकवाद पर करारा हमला कौन भूला सकता है। मोदीजी की विदेश नीति में उनकी सहभागिता भी उल्लेखनीय है। मोदीजी के विदेश जाने से पहले वह वहां जाकर सानुकूल पृष्ठभूमि वह सजा देती थी। सुरेश प्रभु ने रेलवे मंत्री के रूप में ट्वीट पर संज्ञान लेकर जो सहायता और काम शुरू किया तो सुषमाजी ने भी विदेश मंत्री के रुप में विदेश में बसे अनेक भारतीयो की सहायता की।

एक समय जिसको प्रतिस्पर्धी माना, नहीं स्वीकारा एसे मोदीजी प्रधानमंत्री बने और  मोदीजी ने भी सुषमाजी का अनुभव व निपुणता देखकटुता भूल उन्हें इन्दिराजी के बाद दूसरी महिला विदेश मंत्री बनाया तो फिर वह शिस्तबद्ध कार्यकर्ता बन अपने दायित्व को कुशलतापूर्वक निभाया। स्वास्थ्य खराब हुआ तो चुनाव न लडने की घोषणा करने की हिंमत भी दीखाई।

प्रभु उनकी आत्मा को शांति दे। 

Monday, July 22, 2019

कर्णाटक: सत्ताभूख, विधानसभा अध्यक्ष और कानूनी दांवपेच का नंगा नाच

कर्णाटक के मुख्यमंत्री कुमारस्वामी बार बार रो रो कर कहते दिखाई दिये कि वह कॉंग्रेस की कठपूतली है
(तसवीर सौजन्य: गूगल)

कर्णाटक में जो पीछले २२ दिनों से हो रहा है, उस को क्या कहा जा सकता है? कॉंग्रेस के विधानसभा अध्यक्ष और कानूनी दांवपेच का नंगा नाच ही तो कहा जा सकता है। जो त्यागपत्र आये थे वह सिद्धरमैया ग्रूप के आये थे। और सिद्धरमैया जेडी(से) के पुराने नेता है। उनकी और कुमारस्वामी की पटती नहीं। रामलिंगा रेड्डी जैसे निष्ठावान कॉंग्रेसी ने क्यों त्यागपत्र दिया? कहा जा रहा है कि उप मुख्य मंत्री जी. परमेश्वर रामलिंगा रेड्डी को पूछे बिना निर्णय लेते थे। यही रामलिंगा रेड्डी की व्यथा है। सिद्धरमैया के गुट ने उन को मुख्यमंत्री बनाने को यह चाल चली, जिस का निःशंक भारतीय जनता पक्षने फायदा उठाया। मुंबई में उनको संरक्षण दिया। स्वस्थ विधायक हॉस्पिटल में बहाना कर के प्रवेश कर गये और अस्वास्थ्यप्रद पंजाबी खाने का आनंद उठाते दिखें।
लेकिन, जेडीएस और कॉंग्रेस की आपस की लड़ाई और कॉंग्रेस की अंदरुनी गुटबाजी का ठीकरा भारतीय जनता पक्ष के उपर फोडा जा रहा है। संसद में कॉंग्रेस ने इस को भाजप के नाम कर दिया कि भाजप इस सरकार को गिराना चाहती है। हकीकत तो ये है कि कुमारस्वामी स्वयं कई बार रो कर निवेदन दे चूके थे कि वह कॉंग्रेस के क्लर्क की तरह ही है। संसद परिसर में सोनिया गांधी और राहुल गांधी ने धरना दे कर यह चित्र ओर मजबूत बनाया। लेकिन विधानसभा अध्यक्ष और कानूनी दांवपेच के नंगे नाच के बारे में कोई मिडिया बात नहीं कर रहा। चुनाव के बाद कोई भी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला था, उस समय कॉंग्रेस ने आधी रात सर्वोच्च में आवाज़ लगाई और सर्वोच्च खुल गई! येदियुरप्पा के वकील ने कितने दिन मांगे थे? १५ दिन! किन्तु सर्वोच्च ने येदियुरप्पा को केवल एक दिन का समय दिया था।
शंकरसिंह वाघेला को गुजरात के मु.मं. के रूप में शपथ दिलवा रहे राज्यपाल कृष्णपालसिंह
(तसवीर: गूगल)
याद है गुजरात का एसा ही घटनाक्रम?
अब जब जेडीएस और कॉंग्रेस की सरकार अल्प मत में है तो १५ दिन नहीं, २१ दिन बीत चूके है और आज मैं जब यह लिख रहा हूं, २२ जुलाई रात ८.२७ को, तब समाचार मिल रहे है कि अभी भी मोरचा सरकार के विधायक ओर ज्यादा समय विश्वास मत के लिए मांग रहे है! तब यह कानून व्यवस्था कहां गई? आप को क्वचित याद हो कि गुजरात विधानसभा में कॉंग्रेस के नेता जो उस समय विधानसभा के सभापति थे, चंदुभाई डाभी ने भाजप के विद्रोही विधायको के गूट को अलग दल की मान्यता दे दीं। विधानसभा में कॉंग्रेस के शक्तिसिंह गोहिल आदि ने तोडफोड की, माइक फेंके गये, कॉंग्रेस के नेता एसे राज्यपाल कृष्णपालसिंह ने जरा भी देरी नहीं कि और देवेगोवडा की कॉंग्रेस समर्थित तीसरे मोरचे की सरकार को रिपॉर्ट भेजा जिस के आधार पर राष्ट्रपति शंकरदयाल शर्मा ने गुजरात में राष्ट्पति शासन लगा दिया।
उस समय शंकरसिंह वाघेला को बहुमत साबित करने के लिए सात दिन दिये गये थे जब कि उपर उल्लेखित किस्से में येदियुरप्पा को एक ही दिन मिला।
अब आईये एक दृष्टि करते है कि कैसे विधानसभा अध्यक्ष के. आर. रमेशकुमार और कानूनी दांवपेच से अल्प मत वाली कुमारस्वामी सरकार को विश्वास मत लेने के लिए लंबा समय मिलता चला गया।
विधानसभा अध्यक्ष के. आर. रमेशकुमार ने शकुनी चाल से कर्णाटक की मोरचा सरकार को बारबार जीवनदान दिया
(तसवीर: गूगल)

२२ दिनों का घटनाक्रम
१ जुलाई २०१९:  कॉंग्रेस के दो विधायको ने त्यागपत्र दिये।
६ जुलाई २०१९: मोरचा सरकार के ११ विधायको ने त्यागपत्र दिये।
६ जुलाई २०१९: कॉंग्रेस के धनिक विधायक डी. के. शिवकुमार (जिन के रिसॉर्ट में २०१७ में गुजरात में अहमद पटेल की प्रतिष्ठा पर बन आनेवाले राज्यसभा चुनाव में कॉंग्रेस के विधायको के जलसा (ऐसा गुजरात के बनासकांठा के विधायक गोवाभाई रबारी ने ही कहा था) करवाया गया था) ने कहा कि मैंने विद्रोही विधायको के त्यागपत्र फाड डालें है। इस के लिए मैं जैल जाने को तैयार हूं।
६ जुलाई २०१९: जेडीएस-कॉंग्रेस के विद्रोही विधायक मुंबई पहोंचे।
७ जुलाई २०१९: मुख्यमंत्री कुमारस्वामी अमरिका से लौटे।
७ जुलाई २०१९: त्यागपत्र देनेवाले विधायको की संख्या बढ के १३ हुई।
८ जुलाई २०१९: सरकार बचाने के लिए कॉंग्रेस के सभी ३१ मंत्रियों ने त्यागपत्र दिये। जेडीएस के मंत्रियो ने भी त्यागपत्र दिये।
८ जुलाई २०१९: (यहां आप नॉट कीजिएगा कि विद्रोहीओ के त्यागपत्र ६ जुलाई को आए थे, तब से अध्यक्ष छुट्टी पर थे) अध्यक्ष छुट्टी पर है, इस लिए त्यागपत्र को स्वीकारना, नहीं स्वीकारना इस का निर्णय टला।
९ जुलाई २०१९: अध्यक्ष छुट्टी से लौटे, लेकिन उन्हो ने कहा कि विद्रोही विधायक उन से नहीं मिले। १३ में से केवल ८ त्यागपत्र ही नियम अनुसार है। (अर्थात् ८ त्यागपत्र तो नियमानुसार थे उन्हों ने स्वीकारा था, किन्तु यह निर्णय भी उन्हों ने कैसे टाला, और इस में कानूनी दांवपेच का उन को कैसे साथ मिला यह आगे आप को पता चलेगा)
१० जुलाई २०१९: कॉंग्रेस के दो विद्रोही विधायकों ने अध्यक्ष को त्यागपत्र दिये। (अर्थात् अब तो नियमानुसार स्वीकार होना चाहिए था, लेकिन अब भी टालंटोल का खेल जारी रहा)
१० जुलाई २०१९: विद्रोही विधायक सर्वोच्च न्यायालय गये। उन्हो ने याचिका की कि हमारे त्यागपत्र विधानसभा अध्यक्ष नहीं स्वीकार कर रहे। आप आदेश दीजिए। लेकिन सर्वोच्च, जिस ने भाजप के येदियुरप्पा के केस में आधी रात को बैठ कर उन को केवल अगले दिन चार बजे तक अर्थात् ११ से ४ बजे तक पकडे तो केवल पांच घंटे का समय दिया था, उस ने सुनवाई अगले दिन अर्थात् ११ जुलाई तक टाल दी।
११ जुलाई २०१९: सर्वोच्च न्यायालय ने विधायको को अध्यक्ष को मिलने का आदेश दिया। अध्यक्ष ने भी सर्वोच्च में याचिका कर डाली। जिस पर सर्वोच्च ने १२ जुलाई सायं ६ बजे का समय दिया। अर्थात् फिर से येदियुरप्पा के मामले से तुलना करे तो दो घंटे ज्यादा समय दिया!
११ जुलाई २०१९: कॉंग्रेस की नेत्री सोनिया गांधी और राहुल गांधी ने संसद परिसर में धरना कर के ऐसा चित्र बनाने का प्रयास किया जैसे भाजप कर्णाटक की जेडीएस-कॉंग्रेस सरकार को अस्थिर करने का प्रयास कर लोकतंत्र का गला घोंट रहा है। जब कि विधानसभा अध्यक्ष और सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय से मोरचा सरकार को ओर समय मिल रहा था कि वह विद्रोही विधायको को (अगर भाजप ने खरीदा है तो) वापस खरीद सकें।
१२ जुलाई २०१९: सर्वोच्च के निर्णय ने फिर से मोरचा सरकार का जीवनदान लंबा कर दिया। उस ने स्टॅटस क्वॉ अर्थात यथा परिस्थिति रखने का आदेश दिया! अर्थात् अध्यक्ष को त्यागपत्र स्वीकारना या उन को गेरलायक ठहराने का निर्णय नहीं लेना है। माना कि १२ जुलाई को शुक्रवार था, सो अगली सुनवाई १५ जुलाई को हो सकती थी, लेकिन सर्वोच्च ने सुनवाई १६ जुलाई तक टाल दिया जिस से मोरचा सरकार को अपनी बाज़ी संभालने का ओर समय मिल गया।
१२ जुलाई २०१९: विद्रोही विधायको के वकील ने दलील की थी कि विधानसभा अध्यक्ष मिडिया को संबोधित करने के लिए समय निकाल सकते है लेकिन विधायको के त्यागपत्र की दस लाइन पढने के लिए उनके पास समय नहीं है!
१२ जुलाई २०१९: अब आप देखिये कि कॉंग्रेस कैसे कानूनी दांवपेच में निपुण है और भाजप इसी क्षेत्र में मार खा जाता है। चाहे वह राममंदिर हो, चाहे वह धारा ३५-ए, धारा ३७० हो, या अहमद पटेल के समय राज्यसभा चुनाव के समय चुनाव आयोग के समक्ष जो प्रस्तुति करनी थी, वह हो, या २०१८ के कर्णाटक चुनाव के बाद येदियुरप्पा को बहुमत साबित करने का केस हो, वह अपनी बात न्यायालय में ठीक से नहीं रख पाता। और रख पाता होगा तो क्वचित सूनी नहीं जाती होगी। तो १२ जुलाई २०१९ को कॉंग्रेस के एक-दो नहीं, किन्तु ४०० कार्यकरो ने कर्णाटक मामले में हस्तक्षेप की याचिका कर दी। और मांग की कि विद्रोही विधायको को गेरलायक ठहराये जाये।
१३ जुलाई २०१९: इस के सामने कॉंग्रेस-जेडीएस के पांच ओर विधायको ने सर्वोच्च में पहेले जो याचिका हुई थी उस में जुडने के लिए याचिका की।
१३ जुलाई २०१९: कॉंग्रेस के कुछ विधायक बातचीत के लिए मुंबई से कर्णाटक आये।
१४ जुलाई २०१९: लेकिन बात नहीं बनी। वे वापिस मुंबई चले गये।
१५ जुलाई २०१९: विद्रोही विधायको ने मुंबई पुलीस से कहा कि वे कॉंग्रेस के नेताओ से मिलना नहीं चाहते।
१६ जुलाई २०१९: विधानसभा अध्यक्ष ने त्यागपत्र पर विचार करने के लिए सर्वोच्च से ओर समय मांगा। (अर्थात् एक बार ओर मामला टाला और उसे न्याय व्यवस्था ने टलने दिया)
१७ जुलाई २०१९: सर्वोच्च न्यायालय ने आदेश दिया कि अध्यक्ष निर्णय कर सकते है कि उन्हें त्यागपत्र स्वीकारना है कि नहीं स्वीकारना। (यह स्पष्ट केस था कि सर्वोच्च निर्णय कर सकता था कि त्यागपत्र स्वीकारना चाहिए कि नहीं। लेकिन सर्वोच्च ने निर्णय नहीं किया) कॉंग्रेस को खुश करने के साथ भाजप को खुश करने के लिए सर्वोच्च ने ये भी कहा कि विद्रोही विधायकों को विधानसभा में उपस्थित रहने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। फिर भी सर्वोच्च ने येदियुरप्पा के केस के अनुसार बहुमत के लिए कोई समयसीमा नहीं रखी। (हो सकता है विद्रोही विधायको ने मांगी न हो)
१८ जुलाई २०१९: विधानसभा की कार्यवाही मिली। लेकिन जानबूज कर हंगामा किया गया। इस से दोपहर तीन बजे तक सदन स्थगित किया गया। एसी नीति ही चलती रही। दिन में दो बार सदन स्थगित हुआ। विपक्ष के नेता येदियुरप्पा ने कहा कि हम रात भर बैठने को तैयार है। लेकिन उन की एक न सूनी गई। राज्यपाल वजुभाई वाळा ने मुख्यमंत्री कुमारस्वामी और विधानसभा अध्यक्ष पत्र लिखकर सायं छ बजे तक की समयसीमा विश्वास मत के लिए दी थी। वह समय सीमा का भी उल्लंघन हुआ। अंत में राज्यपाल वजुभाई वाळा ने दूसरी बार हस्तक्षेप किया। उन्हों ने मुख्यमंत्री कुमारस्वामी और विधानसभा अध्यक्ष को पत्र लिख १९ जुलाई दोपहर १.३० तक विश्वास मत लेने को आदेश दिया। भाजप के विधायक रातभर सदन में ही धरने पर रहें।
१९ जुलाई २०१९: इस दिन भी विधानसभा नहीं चलने दी गई। अंत में यह २२ जुलाई तक कार्यवाही स्थगित की गई। अर्थात् ओर तीन दिन ले गये।
२१ जुलाई २०१९: बहुजन समाज पक्ष की सर्वोच्च नेत्री मायावती ने अपने विधायक को सदन में उपस्थित न रहेने को कहा। लेकिन बाद में निर्णय पलट दिया गया। स्पष्ट है कि इन का भी भावताल हो गया होगा।
२२ जुलाई २०१९: आज सदन मिला और आज भी हंगामा होता रहा। लेकिन विधानसभा अध्यक्ष के मन में राम बसे। उन्होंने कहा आज शाम छ बजे तक विश्वास मत हो जाना चाहिए। लेकिन कॉंग्रेस-जेडीएस ने ‘संविधान बचावो’ के नारे लगाकर येदियुरप्पा को बोलने न दिया। आज भी रात नव बजे के करीब येदियुरप्पाने कहा था कि वे (अर्थात् भाजप के विधायक) रात १२ तक बैठने को तैयार है। समाचारसंस्था एएनआई ने कुमारस्वामी के टेबल पर उनका त्यागपत्र तैयार होने का समाचार तस्वीर के साथ ट्वीट किया। अर्थात् कुमारस्वामी जानते है कि उनका जाना निश्चित है। फिर भी समय अकारण व्यय कर रहे है। रात दस बजे समाचार आये कि विधानसभा अध्यक्ष ने विद्रोही विधायको को कल अर्थात् २३ जुलाई को ११ बजे तक उनसे मिलने के लिए नॉटिस प्रकाशित की है। रात ११.३८ को समाचार आया कि येदियुरप्पा फिर से कह रहे है कि हम रात बारह बजे तक बैठने को तैयार है। लेकिन रात ११.४९ को समाचार मिले कि अध्यक्ष ने कल अर्थात् २३ जुलाई सायं छ बजे तक विश्वास मत लेने की समयसीमा निश्चित की है। अर्थात् जेडीएस-कॉंग्रेस को सरकार बचाने के लिए एक पूरा दिन फिर से मिल गया। इसी समय ओर एक समाचार आया कि सदन स्थगित कर दिया गया है। अब कल सुबह दस बजे मिलेगा।....
(उपरोक्त सारा घटनाक्रम गणमान्य अंग्रेजी और हिन्दी अखबारों की वेबसाइट पर प्रतिदिन जो लाइव खबरें चलती है उससे लिया गया है। हो सकता है कि बाद में ये वेबसाइट पर से ‘उपरी’ आदेश के कारण कुछ खबरें हटा दे तो यह लेखक का दोष नहीं है)
आईएमए ज्वेल्स के मन्सूर खान पर रू. ५००० करोड के घोटाले का आरोप है
(तसवीर : गूगल)

मिडिया द्वारा बिलकुल अनदेखी
अब सोचिये, यही कहानी किसी भाजप शासित राज्य की होती तो? लेकिन आप टीवी पर प्रति दिन मोब लिंचिंग, हिन्दू-मुस्लिम, साक्षी मिश्रा का दलित युवक के साथ विवाह इसी ब्रेकिंग इन्डिया एजन्डे पर डिबेट देखते है। कर्णाटक में ५००० करोड का आईएमएलए ज्वेल्स घोटाला हुआ। इस का मालिक मन्सूर खान भाग गया था। लेकिन मोदी सरकार की सजगता से वह पकडा गया। इस में कर्णाटक के कॉंग्रेस के विधायक रोशन बेग पर रू. ४०० करोड की रिश्वत के आरोप है। उन की गिरफतारी हुई तो कुमारस्वामी ने मोदी सरकार पर दुर्भावना का आरोप लगाया। इस घोटाले में एक लाख से ज्यादा निवेशकारो जिस में बडी मात्रा में मुस्लिम थे क्योंकि इस को इस्लामिक सिद्धांत अनुसार निवेश कहा गया था, जिस के लिए मौलवीओने फतवा भी प्रगट किया था, तो ये मुस्लिम अब अपना पैसा डूबने के कारण रो रहे है। लेकिन जो कॉंग्रेस, टीवी चेनल और बुद्धिजीवी को चोर तबरेज़ अन्सारी की मोब लिंचिंग में मृत्यु से दुःख होता है उन को इस घोटाले में रो रहे मुस्लिमो के लिए कोई दु:ख नहीं होता।
 

Friday, July 5, 2019

बजेट २०१९ का अच्छा-बूरा

सौजन्य : इन्टरनेट
एक तरफ यह बहीखाता (#Budget2019) अंग्रेजो की निशानी समाप्त करने की ओर भाजप सरकार द्वारा तीसरा कदम है -१. शाम पांच बजे बजेट की परंपरा समाप्त करना। २. हर बार फरवरी के अंतिम दिन ही बजेट प्रस्तुत होने की ब्रिटिश परंपरा को समाप्त करना। ३. ब्रीफ केस में बजेट ले जाने की परंपरा समाप्त करना। बजेट का नाम खातावही करना।
गांव, गरीब, किसानो के लिए इस बजेट में काफी कुछ है। मध्यम वर्ग के लिए कुछ नहीं है, यह कहना ठीक नहीं होगा क्योंकि अंतरिम बजेट में ही मध्यम वर्ग के लिए आयकर छूट दी गई थी। छोटे व्यापारीओ के लिए पेन्शन, ५९ मिनिट में लॉन, उच्च शिक्षा के लिए रू. ४०० करोड, नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति, अनुसंधान पर जोर, इन्फ्रास्ट्रक्चर पर जोर, मेट्रो रेलवे पर जोर, महिलाओ के लिए मुद्रा योजना में सहायता, अमीरों पर ज्यादा टॅक्स, लेकिन कंपनीओ के लिए कॉर्पोरेट टॅक्स में छूट आदि कई बातें अच्छी है।
लेकिन जो गंभीर बात है, वो यह है कि मिडिया में विदेशी निवेश को छूट दी गई है। इसी प्रकार बीमा में भी विदेशी निवेश को छूट दी गई है। मिडिया पर विदेशी कंट्रॉल हो यह तो पत्रकारों के लिए अच्छी बात ही होगी, क्योंकि वह ज्यादा वेतन देगा। लेकिन हम देखतें हैं कि ज्यादातर विदेशी मिडिया में जो भारत संदर्भ में खबर आती है, वह भारत के लिए नेगेटिव और ज्यादातर झूठी होती है। न्यू यॉर्क टाइम्स, टाइम्स, हफिंग्टन पॉस्ट, बीबीसी आदि इस के उदाहरण है।
इसी प्रकार बीमा हो या, अन्य क्षेत्र विदेशी निवेश का भाजप और संघ परिवार हंमेशां विरोध करता आया है। यह नीति उलट कर देना यह अच्छी बात नहीं है।

रेलवे का प्राइवेटाइझेशन की ओर कदम पीपीपी यह अच्छा होगा, या बूरा ये तो समय ही कहेगा। लेकिन अब तक रेलवे इतना बडा नेटवर्क होने के उपरांत अपना काम अच्छे ढंग से करते आया है। नरेन्द्र मोदीजी जैसे भारतीय चुनाव आयोग द्वारा लोकसभा चुनाव आयोजन करने का विश्व  के संदर्भ में प्रशंसा करते है और मानते है कि इसका पूरे विश्व में प्रचार करना चाहिए, उसी प्रकार रेलवे का भी प्रचार करने की आवश्यकता है।
एसा कहा जाता है कि नॉ लंच इझ फ्री। यह मानसिकता तभी काम करती है, जब सामने एसी सुविधा मिलती हो। आज हाइवे तो अच्छे है लेकिन टॉल टॅक्स कितना चुकाना पडता है? यह दलील कि जा सकती है कि हाइवे मेइनटेइन होने के कारण तेज गति से एक स्थान से दूसरे स्थान की ओर बढा जा सकता है। जिस से समय और तेल दोनों का बचाव होता है। लेकिन यह टॉल टॅक्स भी तार्किक होना चाहिए। पीछली मोदी सरकार में वर्ष २०१५ में नीतिन गडकरी जी ने टॉल टॅक्स दूर करने की बात की थी, लेकिन हुआ नहीं। उन्हों ने ही २०१८ आते आते टॉल टॅक्स दूर करने की बात को नकार दिया। प्रश्न यह उठता है कि वाहन खरीदते समय रॉड टॅक्स दिया जाता है, पेट्रोल-डीझल पे टॅक्स लगता है, आयकर दिया जाता है, जीएसटी दिया जाता है, इतने सारे टॅक्स दिये जाते है फिर भी टॉल टॅक्स लगता है, स्टेच्यू ऑफ यूनिटी में इतनी फी देखने के लिए ली जाती है, तो भी आज मूलभूत सुविधा जैसे स्वच्छ पानी, स्वच्छ नदी, स्वच्छ शहर आदि क्यों नहीं मिलती? अमदावाद में पीराणा में कचरे का पहाड बन गया है, इस को हटाने की बात क्यों नहीं होती?
ठीक है कि पीछली मोदी सरकार में उस से पहेले की कॉंग्रेस सरकारो पर दोषारोपण किया जा सकता था, लेकिन अब एसा नहीं किया जा सकता। करेंगे तो लोग स्वीकारेंगे भी नहीं।
इसी प्रकार सरकारी इकाइयों का निजीकरण करना भी अच्छी बात नहीं है। नरेन्द्र मोदीजी ने तो गुजरात में घाटा कर रहे GSFC, GACL, GUVNL और GEB को मुनाफा करनेवाली कंपनियां बना दी थी और इसी मॉडल पे तो वे २०१४ का लोकसभा चुनाव जीते थे। सरकारी कर्मचारी अगर काम नहीं कर रहे है और कंपनीओ को घाटा करवा रहे है, तो hire and fire की नीति अपनाई जा सकती है। लेकिन इसी कारण इन का निजीकरण कर देना यह आलोचना को आमंत्रण देना होगा, जो एक समय भाजप करता था।
बॅन्क से वर्ष में १ करोड रकम निकालने पर २ % कर लगाना भी समज में नहीं आता। अपने पैसे निकालने पर क्यों कर देना पडे? हो सकता है यह तार्किक हो, लेकिन इस के लिए तर्क समजाना लोगों को जरूरी है।
उच्च शिक्षा पर रू.४०० करोड का प्रावधान करना अच्छा कदम है। नेशनल रीसर्च फाउन्डेशन का कदम भी अच्छा है। लेकिन साथ में प्राथमिक शिक्षको को जितना सरकारी चुनाव, मतदान, जनसंख्या गिनती, आदि कामों में दौडाया जाता है इस के सापेक्ष में प्रॉफेसरो को क्यों काम में नहीं लगाया जाता? उनका वेतन भी अच्छा खासा होता है। और सेमिनार, कॉलम राइटिंग, बुक ऑथरिंग जैसे अपने निजी लाभ वालें काम वे ज्यादा करते है। वे अपना काम जो कि विद्यार्थीओ को अच्छा शिक्षण देना है, वह भी अच्छा करते तो समज में आता भी। लेकिन वैश्विक स्तर पर उच्च शिक्षण में भी हम बहोत पीछे हैं। यह बताता है कि प्रॉफेसर समुदाय अपना काम ठीक से नहीं कर रहा है। मैं इस के लिए सारे प्रॉफेसरो की आलोचना नहीं कर रहा हूं। लेकिन एक गणनापात्र संख्या तो है हि जो अपना काम ठीक से नहीं करते।
इसी तरह, गंगा पर कार्गो चलाना भी, मेरी दृष्टि से पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने की बात होगी। इस से हो सकता है कि व्यापार में वृद्धि हो, लेकिन पर्यावरण और समुद्री/नदी में रहते जीवों का नुकसान होगा।

Tuesday, July 2, 2019

सोचों कभी एसा हो तो क्या हो?


विराट कोहली के नेतृत्व में भारत की टीम बूरा प्रदर्शन कर रही है।
विराट कोहली स्वयं दो चार रन बनाकर पेवेलियन लौट जाते है।
विराट बुमराह को ऑपनिंग में और रोहित शर्मा को बोलिंग में ऑपनिंग में भेजते है।
विराट महेन्द्रसिंह धोनी को बाउन्डरी पे फिल्डिंग करने खडा कर देते है। और स्वयं कीपिंग करते है।
लेकिन वो बीच बीच में इन्जर्ड हो कर पेवेलियन लौट जाते है।
दो तीन बैट्समेन एसे है जो बहोत धीमा खेलते है और सामनेवाले बैट्समेन को रन आउट करा देते है।
वे अपने साथीओ के साथ विरोधी टीम की प्रशंसा करते रहते है।
लेकिन विराट उन को चेतावनी देने की जगह उन को प्रमोट करते रहते है।
बहोत आलोचना हो तो उन को एक या दो मैच में विराम देकर फिर से दूसरी मैचों में खिलाते है।
मैच से पहले भारतीय टीम प्रेक्टिस करती दिखती नहीं।
मैच समाप्त होने के बाद विराट रिलैक्स होने थाइलेन्ड चले जाते है।
विराट कोहली हंमेशां मैच से पहले विरोधी टीम की आलोचना करते ट्वीट करते है।
अपने लिए वो रनर मंगाते है।
हर बार मैच हार जाने के बाद विराट डीआरएस की आलोचना करते है। वो कहते है कि हम डीआरएस के कारण हारें हैं।
मैच हारने के बाद विराट कहते है, "हम नहीं हारें, हिन्दूस्तान हार गया।"
विश्व कप श्रेणी समाप्त होने के बाद विराट अपने कप्तान पद से त्यागपत्र दे देते है।
उन की बहन और माता हार के लिए टीम को जिम्मेदार ठहराते है और कहते है, "आप लोग बराबर नहीं खेलें, इस लिए हम हार गयें, वर्ना मेरे भाई ने तो अच्छा ही खेला था।"
उनको पहेले अपनी टीम मनाने आती है तो वो कहते है, "नहीं, मैं कप्तान नहीं रहना चाहता।" टीम के सारे खिलाडी त्यागपत्र दे देते हैं।
फिर मैनेजर आते है तो भी वो कहते है, "नहीं, मैं कप्तान नहीं रहना चाहता।"
फिर कॉच आते है तो भी वो कहते है, "नहीं, मैं कप्तान नहीं रहना चाहता।"
फिर सिलेक्शन कमिटी आती है, तो भी वो कहते है, "नहीं, मैं कप्तान नहीं रहना चाहता।"
फिर बीसीसीआई की कमिटी आती है, तो भी वो कहते है, "नहीं, मैं कप्तान नहीं रहना चाहता।"
फिर उनका एक कथित फैन आत्महत्या की कोशिश करता है और वे कहते है, "ठीक है, आप कहते है तो मैं कप्तान पद पर चालु रहता हूं, लेकिन हार के लिए मुझे मत जिम्मेदार गिनयेगा।"
आज कल कॉंग्रेस में यही ड्रामा चल रहा है।
😀😀😀😀😀😀😀😀😀😀😀😀

Friday, May 10, 2019

हुआ तो हुआ : ये कॉंग्रसी मान-'सिक'-ता है


कॉंग्रेस प्रमुख राहुल गांधी को सलाहकार और कॉंग्रेस जिनको टेलिकॉम क्रांति का श्रेय देती है एसे साम पित्रोडा आजकल मणिशंकर अय्यर सी कमी पूरी कर रहे है।  पहले उन्होंने कहा कि २६ नवम्बर रा मुंबई हमला पाकिस्तान को कुछ लोगों का कुसूर था। उस में पाकिस्तान का कोई दोष नहीं था। इसी प्रकार पुलवामा की घटना को बाद अॅर स्ट्राइक करने की क्या जरूरत थी? साम पित्रोडा ने गरीबों की  आय १२००० प्रति मास करने की योजना  को बारे में कहा कि मध्यम वर्ग स्वार्थी न बनें।  उसको ज्यादा कर चुकाना होगा। और अब १९८४ के सिख दंगे पर उन्होंने कहा कि हुआ तो हुआ।

ये केवल साम पित्रोडा या विचार नहीं है, पूरी कॉंग्रेस का विचार है। सूचि देखिये। हर बार कॉंग्रेस कि रवैया एसा ही रहा है- हुआ तो हुआ ।

➡️१९४७ में देश का विभाजन - हुआ तो हुआ
➡️विभाजन में कई लोग रातोरात मारे गये- हुआ तो हुआ
➡️आधे कश्मीर पर पाकिस्तान का  कब्जा - हुआ तो हुआ
➡️जीप घोटाला - हुआ तो हुआ
➡️बीमा घोटाला - हुआ तो हुआ
➡️चीन से पराजय - हुआ तो हुआ
➡️लाल बहादुर शास्त्री या शंकास्पद देहांत- हुआ तो हुआ
➡️गौरक्षा की मांग कर रहे निहत्थे संतो पर संसद से गोलीबार- हुआ तो हुआ
➡️कांग्रेस का विभाजन- हुआ तो हुआ
➡️१९६९ को गुजरात दंगे- हुआ तो हुआ
➡️भ्रष्टाचार ग्लोबल फिनोमिना है - कहा तो कहा
➡️आपातकाल - लगा तो लगा
➡️भिंदरांवाले को -  बडा किया तो किया
➡️फिर स्वर्ण मंदिर में सेना को - भेजा तो भेजा
➡️इन्दिरा की हत्या सिख ने की इस लिए निर्दोष सिखों की हत्या - की तो की
➡️बॉफॉर्स घोटाला - हुआ तो हुआ
➡️सबमरिन घोटाला - हुआ को हुआ
➡️१९८५ के गुजरात दंगे- हुआ तो हुआ
➡️कश्मीर में लाखों हिन्दूओ का नरसंहार- हुआ तो हुआ
➡️कश्मीर में आतंकवाद- फैला तो फैला
➡️कश्मीर से निकलकर पूरे देश में आतंकवाद - फैला तो फैला
➡️१९९३ को दंगे - हुआ तो हुआ
➡️१९९३ को मुंबई बम्ब धमाके- हुए तो हुए
➡️शॅरमार्केट घोटाला- हुआ तो हुआ
➡️युरिया घोटाला- हुआ तो हुआ
➡️चीनी घोटाला - हुआ तो हुआ
➡️टेलिकॉम घोटाला - हुआ तो हुआ
➡️अविश्वास मत जीतने के लिए झारखंड मुक्ति मोर्चा कांड - हुआ तो हुआ
➡️२-जी घोटाला- हुआ तो हुआ
➡️कोलसा  घोटाला-हुआ तो हुआ
➡️कॉमनवेल्थ घोटाला- हुआ तो हुआ
➡️आदर्श घोटाला- हुआ तो हुआ
➡️अगस्ता वेस्टलेन्ड घोटाला - हुआ तो हुआ
➡️नेशनल हेराल्ड घोटाला- हुआ तो हुआ
➡️२००५ दिल्ली धमाके - हुए तो हुए
➡️२००६ वाराणसी धमाके - हुए तो हुए
➡️२००६ मुंबई ट्रेन धमाके - हुए तो हुए
➡️२००७ समझौता धमाके - हुए तो हुए
➡️२००७ हैदराबाद धमाके - हुए तो हुए
➡️२००७ उत्तरप्रदेश धमाके - हुए तो हुए
➡️१ जनवरी २००८ सीआरपीएफ पर हमला - हुआ तो हुआ
➡️२००८ जयपुर धमाके - हुए तो हुए
➡️२६ जुलाई २००८ अमदावाद धमाके - हुए तो हुए
➡️२००८ दिल्ली धमाके - हुए तो हुए
➡️२००८ इम्फाल और असम धमाके - हुए तो हुए
➡️२६ नवेम्बर २००८ मुंबई हमला - हुआ तो हुआ, इस में पाकिस्तान का क्या दोष (साम पित्रोडा उवाच)
➡️२०१० पूणे बम्ब धमाके - हुए तो हुए
➡️२०१० पश्चिम बंगाल में स्लिदा केम्प एटेक - हुआ तो हुआ
➡️२०१० दंतेवाडा में माओवादी हमला - हुआ तो हुआ
➡️२०११ में मुंबई धमाके - हुए तो हुए
➡️२०११ दिल्ली धमाके - हुए तो हुए
➡️२०१३ हैदराबाद धमाके- हुए तो हुए
➡️२०१३ मैं छत्तीसगढ में नक्सली हमला-  हुआ तो हुआ


Friday, April 26, 2019

काल्पनिक इन्टरव्यू: जब शाहरुख मेट राहुल

ये केवल हास्य उत्पन्न करने के लिए काल्पनिक चित्र है।

जिस तर्ज पर अक्षयकुमार ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का इन्टरव्यू लिया उस से लिबरलों-सेक्युलरों को काफी जलन हुई है। पेट में पीडा उठी है। राहुल गांधी ने अब तक सिरियस-पॉलिटिकल इन्टरव्यू भी नहीं दिया (या देने की हिंमत नहीं हुई पीछले लोक सभा चुनाव में अर्नब का इन्टरव्यू के अनुभव को याद कर के) तो अक्षयकुमार जैसा नोन पॉलिटिकल इन्टरव्यू की तो बात ही नहीं आती। चलो, हम एक कल्पना करते है। सब से पहले तो, कौन सा फिल्म कलाकार इन्टरव्यू लेगा। तो स्वाभाविक है कि साथ में आईपीएल मेच देखनेवाला शाहरुख खान पहली चॉइस होगी। तो चलिए, शाहरुख खान राहुल गांधी का कैसे काल्पनिक इन्टरव्यू लेते है, देखते हैं।

शाहरुख: राहुल, नाम तो सूना ही होगा।
राहुल: जी सूना है। आज बिहार में एक सभा में एक बच्चा भी राहुल नाम का था। जिस को मैंने रोजगार का वादा किया है।

शाहरुख: सर, मैं हंमेशां मेरी ही बात करता हूं। 'राहुल नाम तो सूना ही होगा' एसा मैं हंमेशां मेरी फिल्मों में बोलता रहता हूं।
राहुल: अच्छा, आप की फिल्में...यस, मैं देखता हूं। 

शाहरुख: कौन सी देखी?
राहुल: झीरो, रा.वन, जब हैरी मेट सेजल, रइस...बहोत अच्छी थी। मैं अगर प्रधानमंत्री होता तो आप को नेशनल एवोर्ड मिलना ही था।

शाहरुख: (तभी मैं सोचूं कि मेरी इतनी बकवास फिल्मों को कैसे दर्शक मिल जाते है) सर, आप थियेटर में गये तब आपने क्या खाया था?
राहुल: समोसा। समोसा मुझे बहोत प्रिय है। मैं चुनाव के दौरान एयर क्राफ्ट में भी खाता हूं।

शाहरुख: चटनी के साथ, या बिना चटनी के?
राहुल: मैं कैसे भी खा सकता हूं।

शाहरुख: ओर क्या पसंद है आप को?
राहुल: नमकीन। अभी हम उत्तर प्रदेश में दौरे पर थे तब एक ढाबे पर गये थे, राज बब्बरजी और ज्योतिरादित्य सिंधिया और प्रियंका हमारे साथ थीं। तब गरीबों को खास बुलाया गया था। उस के बच्चों के साथ प्रियंकाने बात की थी, लेकिन मेरा ध्यान तो नमकीन सफाचट करने पर ही था। जैसे हमारे कमलनाथजीने मध्य प्रदेश में गर्भवती महिलाओं के पैसे को सफाचट किया है।

शाहरुख: आप के बचपन की बात करते हैं, सर आप को बचपन में किस नाम से जाना जाता था?
राहुल: राहुल द विंची (ओह सोरी, मम्मा ने मना किया था, ये नाम मत बोलना) नहीं नहीं, पप्पु (ओह, ये तो भाजपा के आईटी सेल ने दिया हुआ है) नहीं नहीं राहुल ही बुलाते थे।

शाहरुख: सर, आप बचपन में खेल खेलते थे?
राहुल: हाँ, मैं और प्रियंका अक्सर कुर्सी का खेल खेलते थे।

शाहरुख: ये खेल क्या होता है?
राहुल: ये वैसे है तो म्यूझिकल चॅयर जैसा ही खेल, लेकिन हमें दादीमां इस तरह समजाती थी कि देखो भय्या, ये पीएम की कुर्सी है। इस पर मेरे बाद तुम्हारे पापा बैठेंगे, फिर तुम्हारी बारी है और फिर प्रियंका की। और फिर पहले मैं बेठता था, और नीचे ही नहीं उतरता था। तो प्रियंका कहती थी, "देखिए भय्या, एसा नहीं चलेगा। मुझे भी बैठना है।" तो मैं उसे कहता था, "मेरे रहते तूं नहीं बैठ सकती।" और हमारा झगडा होता था।

शाहरुख: ये 'देखिये भैया' क्या ईन्दिराजी भी बोलती थी? प्रियंका भी बोलती थी?"
राहुल: नहीं, ये तो मैं कह रहा हूं।

शाहरुख: तो आप लोग झगडते भी थे?
राहुल: हाँ, बिलकुल। हम लोग कुर्सी के लिये झगड सकते हैं।

शाहरुख: आप के बचपन का शूरवीरता का कोई किस्सा सुनाईये।
राहुल (धीरे से): (क्या ये सवाल जरूरी है?)
शाहरुख (धीरे से): सर, ये सवाल मोदीजी को भी पूछा गया था।
राहुल (ठीक है): देखिये भय्या, मैं बचपन में बहोत शूरवीर था।  जिस तसवीर में ढेर सारे कमल खिले हुए तालाब कि किनारे दादी, पापा, मम्मा, प्रियंका और मैं बेठे हुए थे, उस तालाब के कमल को मैंने छूने की शूरवीरता दिखाई थी।

शाहरुख: अच्छा, वेरी गूड। फिर क्या हुआ।
राहुल: फिर मम्मा ने कहा, भूल से भी कमल के फूल को न छूना। ये सांप्रदायिक बात है। कमल है वो विष्नु और लक्ष्मी जी को चढाया जाता है। इस लिए उसे मत छुओ। उसे छूने जाओगे तो तुम्हारे हाथ किचड से मैले हो जाएंगे।

शाहरुख: सही बात है, कमल वैसे भी आप की राइवल पार्टी का निशान है ना?
राहुल: ओह, अच्छा? ठीक है।

शाहरुख: चलिये, चल के बात करते है। आप हंमेशां इतना फ्रेश कैसे नजर आते हो?
राहुल: मैं कभी टेन्शन लेता ही नहीं। आपने देखा होगा, मैंने कभी जीतने का टेन्शन लिया ही नहीं। और चूंकि मैं टेन्शन लेता नहीं, इस लिए फ्रेश रहता हूं।
शाहरुख (मन में) आप नहीं लेते इस लिए पक्ष के कार्यकर्ता भी नहीं लेते।

शाहरुख: अच्छा सर, विपक्ष में आप के मित्र है?
राहुल: हां, है ना, अखिलेश, ममताजी का भतीजा, मायावतीजी का भतीजा, नौवीं फेइल तेजप्रताप, सब मेरे मित्र है।
शाहरुख: नहीं सर, मैं विपक्ष का पूछ रहा हूं।
राहुल: तो भय्या, मैं विपक्ष की ही बात कर रहा हूं।
शाहरुख (समजाना मुश्किल है)

शाहरुख: सर, आप ये बताइये, आप ने एक बार एक सभा में फटी हुई जेब दिखायी थी...
राहुल (मुझे प्रियंका ने कहा था, मोदी की तरह ही सारे जवाब देना और कुर्ते के बारे में मोदीजी ने कहा था कि कुर्ते कीं स्लीव उन्हों ने स्वयं फाडी थी तो मुझे भी एसा ही जवाब देना चाहिए) वो मैंने स्वयं फाडी थी। लोगों को कन्वीन्स करने के लिए।
शाहरुख: (अरे, ये मोदीजी की तरह जवाब देने में चूक कर गये)

शाहरुख: सर, आप गाना गुनगुनाते है?
राहुल: बिलकुल, मैं गाना गाता हूं। आई केन सिंग अ सोंग। 

शाहरुख: आप को कौन से गानें पसंद हैं?
राहुल: जीती बाजी को हारना हमें आता है....और दूसरा, जब लाइफ हो आउट ऑफ कंट्रोल बोल भय्या ऑल इज वेल...देखिये भय्या, इस में मेरा पेटन्ट वर्ड भय्या भी आता है।

शाहरुख: सर, ये आमिर के गानें है। ये नहीं चलेगा। मेरे इन्टरव्यू में आमिर का गाना नहीं चलेगा। मैं अपना एक गाना सूनाता हूं। हारे हारे हारे हम तो दिल से हारे....
राहुल: छी, आप के गाने में तो हारना आता है।
शाहरुख: दूसरा सूनाता हूं...जो तेरी खातिर तडपे पहेले से ही, क्या उसे तडपाना ओ जालिमा, ओ जालिमा
राहुल (मन में) ये गीत तो मेरा लगता है।
शाहरुख: अच्छा सर, मैं अपनी बादशाह फिल्म का गाना सूनाता हूं...मैं तो हूं पागल, ये कहूं हर पल, कर कोई हलचल, होने दे कोई दीवानगी..
(राहुल के मुंह पर गुस्सा आ जाता है)

शाहरुख: चलिए सर, मैं आप को अपना डायलोग सूनाता हूं, आप याद रखियेगा...आप को बहोत काम लगेगा।
राहुल: चुनाव में या चुनाव के बाद?
शाहरुख: चुनाव के बाद। डायलोग इस प्रकार है:
कभी कभी जीतने के लिए कुछ हारना पडता है, और हार कर जीतनेवाले को बाजीगर कहते है।
राहुल: तुम्हारी हर बात में हार की बात क्यों आती है?
शाहरुख: क्योंकि मैं भी अभी हारा हुआ इन्सान हूं। इसी लिए तो आप का इन्टरव्यू ले रहा हूं।
(ये काल्पनिक इन्टरव्यू एक हास्य आलेख है, कृपया इसे सिरियसली न लें)