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Wednesday, August 29, 2018

वामपंथी को मिटा दोगे, लेकिन विचार को कैसे मिटाओगे?


जयवंत पंड्या 
संघ और भाजप अर्बन नक्सल का रोना रो रहे है किन्तु वह आये कहां से? विचार का प्रसार कैसे हुआ? क्या ये चिंतन हुआ? इस की काट क्या होगी? कितनो को जैल में डालोगे? इस विचार की जड तक जाना होगा।

संघ जिस वृक्ष की भाजप-विहिप-वनवासी कल्याण आश्रम-मजदूर संघ आदि शाखाएं हैं उसने और उसमें से जन्मे पारिवारिक संगठनो ने शारीरिक और बौद्धिक कौशल्यो के विकास पर तो बल दिया किन्तु चार सब से अधिक महत्वपूर्ण क्षेत्रों के प्रति उदासीनता बरती। यह चार क्षेत्र हैं - मिडिया, अध्यापन, साहित्य, और कला (फिल्म, टीवी, चित्र, नृत्य, संगीत, नाटक इत्यादि) और अभी भी यह उदासीनताने उसका घेरा नहीं छोडा, या यूँ कहिए, संघ  परिवार छोडना नहीं चाहता।

वामपंथी-माओवादी-नक्सली अपने वैचारिक जन्म से ही समुचे विश्व में इस क्षेत्र में मूल जमाये हुए हैं। एक तरह से पूरा विश्व दो धडो में बंटा हुआ है - वामपंथी या उसके विरुद्ध। किसी देश में उसका सामना मूडीवाद और ईसाई विचारो से है तो कहीं समाजवाद, मूडीवाद या हिन्दूवाद से है। हां, यह भी मजेदार सत्य है कि उनका सामना इस्लामिक कट्टरता या आतंकवाद से नहीं है। क्योंकि जहां पर उनका शासन है वहां वे दूसरी किसी भी विचारधारा को पनपने ही नहीं देते। उदाहरण - रशिया, चीन, उत्तर कोरिया। और जहां पर इस्लाम शासन में है वहां भी ऎसा ही है।

इसी कारण से अमरिका हो या भारत, वहां वे राजनैतिक रूप से शून्यवत होने के बावज़ूद खूब होहल्ला मचा पाते है। यह बात इस्लामी कट्टरता पे भी लागु होती है। याद कीजिए सीरिया के बच्चे की वो तस्वीर जिसकी कहानी बाद में गढी़ हुई कहानी साबित हुई। (https://www.express.co.uk/comment/expresscomment/604590/Migrant-crisis-the-truth-about-the-boy-the-beach-Aylan-Kurdi) इससे विपरीत अमरिका, पाकिस्तान, बांग्लादेश में हिन्दूओं पर क्या क्या नहीं बीती! यहां तक कि भारत में कश्मीर में हिन्दू का षड्यंत्रपूर्वक निष्कासन हुआ, यातनाएं दी गई लेकिन क्या उनकी कहानी भारत से इतर कोई जानता भी है? क्या उनकी कोई तस्वीर ने पूरे विश्व को झकझोर के रख दिया? गांधीनगर में अपनेआप को हिन्दूवादी कहनेवाली भाजप सरकार के नाक के नीचे एक ईसाई स्कूल में एक शिक्षक हिन्दू विद्यार्थी को बहनने स्नेह से बांधी हुइ राखी निकालने पर विवश करता है। और कहीं और जगह बिंदी निकलवाता है तो कहीं चूड़ी। सोचिए, यदि पंद्रह में से किसी भी भाजप शासित राज्य में सरकारी शाला में यदि हिन्दू शिक्षक ने किसी इसाई बच्चे का क्रॉस या किसी मुस्लिम बच्ची का बुर्का निकलवाया होता तो अंतरराष्ट्रीय सुर्खि बन गई होती। सिख और बौद्ध की परिस्थिति अलग नहीं है। अमरिका में सिखों विरुद्ध कम हिंसा नहीं होती। उनकी पघडी उतरवाइ जाती है। लेकिन उनकी कौन सूने। म्यांमार और श्रीलंका में बौद्ध पीडित है लेकिन विश्व तो रोहिंग्या और श्रीलंकाई मुस्लिमों को ही पीडित मानता है। यहां तक कि सीरिया जैसे देश में तो मुस्लिम ही मुस्लिम से लड रहा है फिर भी वहां से भागे हुए लोगों के प्रति सहानुभूति ब्रिटेन को छोड पूरे युरोप में है लेकिन उनको भी अनुभूति हो रही है जब फ्रान्स और जर्मनी में फिदायीन हमले होने लगे, नारियों पर यौन हमले (sexual assault) और बलात्कार होने लगे। अमरिका भी इस बात को ट्रम्प और वहां के सर्वोच्च न्यायालय के माध्यम से समज रहा है।


बात संघ खेमे और वामपन्थी - अर्बन नक्सलियों खेमे थी। उसी पर पुनः चलते हैं। करुणा यह है कि भारत में जिस दल के नेता और पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहनसिंहने भी नक्सलवाद को गंभीर खतरा बताया था, वर्तमान घटनाक्रम में आरोपी में से कईयों की गिरफ्तारी कॉग्रेस की केन्द्र और महाराष्ट्र सरकारों में हुई थी उसी दल का अध्यक्ष (राहुल गांधी) आज इसी नक्सल समर्थक के साथ खड़े दिखते हैं। जिस प्रकार से नेहरूजी मार्क्सवाद से प्रभावित हुए और उनको वामपंथियोंने घेरे रखा था (ब्रिटिश दस्तावेज अनुसार नेताजी सुभाषचंद्र बोस के डिप्टी, जो पंडित नेहरू के गाढ मित्र भी थे ऎसे एसीएन नाम्बियार सोवियत जासूस थे जिनको जर्मनी ने अपने देश से निकाल दिया था। नेहरूजी ने उन्हें भारतीय राजदूत बना दिया था।) कम्युनिस्ट नेता  पी सी जोशी ने वामपंथी पत्रिका मेनस्ट्रीम वीकली में नेहरूजी के विषय में यह लिखा,
"Nehru was the one non-Communist leader who drew most avidly from the ideological treasury of Marxism-Leninism as embodied in the victory of the Russian Revolution, the foundation of the first Socialist State and the existence and growth of a World Communist Movement. He respectfully studied the ideas of scientific Socialism as best as he could and with his own limitations."

हालांकि इसी पी सी जोशी को महात्मा गांधी ने ११ जून १९४४ को लिखे अपने पत्र में कई चुभनेवाले प्रश्न पूछे थे।
 उदाहरणार्थ -
१. कम्युनिस्ट पार्टी जिनका आप प्रतिनिधित्व कर रहें है उसका पैसा कहाँ से आता हैॽ क्या उसके जनता द्वारा जांच की अनुमति है?
२. ऎसा कहा जाता है कि कम्युनिस्ट पार्टी ने बीते दो वर्ष में श्रमिकों की हड़ताल के नेताओं और आयोजकों की गिरफ्तारी करने में अंग्रेजों की सहायता की है।

सब से महत्वपूर्ण बात जो महात्मा गांधी लिखते है
३. कहा जाता है कि कम्युनिस्ट पार्टी ने शत्रु भाव से कॉग्रेस संगठन में घूसने की नीति अपनाई हैं।
४. बहार से (अर्थात रशिया और चीन से) आदेश लेना यह कम्युनिस्ट पार्टी की नीति नहीं है?
 नेहरूजी के बाद जब कॉग्रेस का विभाजन हुआ तब इन्दिरा गाँधीजी की कॉग्रेस ने सीपीआई का समर्थन लिया। इन्दिराजी द्वारा लागु आपातकाल का सीपीआई ने समर्थन किया था! जो अब वाणी स्वातंत्र्य और फ्रीडम अॉफ प्रेस की बारबार दुहाई देतें हैं। इसी सीपीआई (जिसके ऊपर उल्लेखित पी सी जोशी नेता थे) के डी राजा सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति चेलमेश्वर से मिलने गये थे और यही चेलमेश्वर ने तीन न्यायमूर्तियों के साथ मिल के न्यायतंत्र में अविश्वास जगाने के लिए बाकायदा प्रेस कांफ्रेंस करके विद्रोह जैसा काम किया था।

राजीव गांधी और नरसिंह राव कदाचित वामपंथियों से खास प्रभावित नहीं रहे। हालांकि भाजपा ने १९८९ में वामपंथियों के साथ वी पी सिंह सरकार को समर्थन जरूर दिया। और २०१२ में भाजपने मुरली मनोहर जोशी के नेतृत्व में वामपंथियों के साथ मिल के रिटेल में एफडीआई का विरोध भी किया। (Precisely on 20 September 2012)

१९९७ में प्रधानमंत्री रहे आई के गुजराल जनता दल से पहले कॉग्रेस में और उससे पहले विद्यार्थी काल में सीपीआई के सदस्य रहे।

मनमोहनसिंह की युपीए प्रथम सरकार को वामपंथियों का समर्थन था। लेकिन जब अमेरिका के साथ परमाणु समझौते पर वामपंथियों ने समर्थन वापस लिया तब पहली (और कदाचित अंतिम बार)  मनमोहन ने वीरता का परिचय देते हुए सोनिया गांधी को भी दृढ़तापूर्वक ना बोलते हुए कहा कि सत्ता जाती है तो जाए किन्तु वामपंथियों से इस पर कोई समझौता नहीं होगा।

सोनिया जी ने युपीए प्रथम के शासन काल में  राष्ट्रीय सलाहकार परिषद (एनएसी) बनाई थी जो नीति निर्धारण करने में इनपुट देती थी। उसमें वामपंथियों का वर्चस्व था। और वर्तमान राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) सरकार ने पीछले वर्ष ९ जनवरी को ७१० फाइलें पब्लिक के सामने रखी वो दर्शाता है कि वास्तव में एनएसी की ही चलती थी।

कॉग्रेस के वर्तमान अध्यक्ष राहुल गांधी भी वामपंथी विचारधारा से प्रभावित हैं। हालांकि राजदीप सरदेसाई जो कि विचारधारा से भाजप के धुर विरोधी माने जाते हैं और कॉग्रेस की विचारधारा के निकट, वह अपनी किताब '२०१४ चुनाव जिसने भारत को बदल दिया' में लिखते हैं, " हालांकि कि स्पष्ट लग रहा था कि राहुल दोहरी जिंदगी जी रहे हैं। दिन में वह विचारकों और कार्यकर्ताओं के साथ व्यस्त रहते थे लेकिन रात में ऐसा लगता था कि वह पेज तीन के चर्चित मित्रों के साथ खुद को सहज महसूस करते थे। ...'

राजदीप ने इसी पुस्तक में लिखा है,
"राहुल गांधी ने अपने 'राजनैतिक प्रशिक्षण' की प्रक्रिया में वामपंथ की ओर झुकाव वाले। शिक्षाविदों का भी सहयोग मांगा था।... जेएनयू की प्रो.सुधा ऐसी ही एक शिक्षाविद थी। राहुल गांधी ने १९९० में जेएनयू में एक सेमिनार में भी हिस्सा लिया था। ब्राह्मण वाद विरोधी दृष्टिकोण के लिए हंमेशा चर्चित दलित बहुजन विद्वान कांचा इलैया भी उनसे जुड़े थे।"

वामपंथ की ओर झुकाव रखने वाले जयराम रमेश भी राहुल को प्रभावित करने वालो में से है। बकौल राजदीप,"मैने राहुल के साथ उनके तालमेल के बारे में जयराम से पूछा कि क्या उन्होंने राहुल के सामाजिक और आर्थिक दर्शन को आकार दिया? उन्होंने कहा, "मैं उनका सलाहकार नहीं था। जब भी उन्हें मदद की जरूरत होती थी तो मैं उनके लिए उपलब्ध था। "

आम आदमी पार्टी की स्थापना काल से प्रशांत भूषण जैसे नक्सलाइट सिम्पेथाइझर जुड़े। आआप को कई neo left मानते है।

तो, संघ परिवार की विफलता यहां भी दिखती है। उपर दर्शाये हुए चार क्षेत्र - मिडिया, अध्यापन, साहित्य और कला के उपरांत उसकी विचारधारा पूरे राजनैतिक क्षेत्र को, खास कर जो सत्ता में रहे, उनको प्रभावित न कर सकी। कर भी कैसे पाती? गांधी परिवार संघ परिवार के और संघ परिवार गांधी परिवार के विरोधी छोर पर ही खडा रहा। और जो संघ परिवार की विचारधारा के निकट थे, चाहे सरदार पटेल हो या मोरारजी देसाई, सत्ता में या तो प्रथम स्थान पर नहीं रहे, रहे तो अल्पकाल के लिए। एक अपवाद नरसिंह राव जी का अवश्य रहा। जिनके बारे में कहा जाता है कि वह धोती के नीचे संघ की खाखी चड्डी पहनते थे ।

और एसा मत मानीए कि कम्युनिस्टो ने केवल कांग्रेस और जनता दल के प्रधानमंत्रीओ को ही प्रभावित किया। सुधीन्द्र  कुलकर्णी जो पहले सीपीएम के कार्ड हॉल्डर सदस्य थे वह १९९६ में भाजप सत्ता के एकदम निकट आ गई तो भाजप में जुड गये। और तो और वह पहले अटलबिहारी वाजपेयीजी  और बाद में लालकृष्ण आडवाणी के निकट के सलाहकार बन गये और दोनो नेताओ की लुटिया डूबो दी।

तो फिर से प्रश्न यह ही आता है कि नक्सल समर्थक वामपंथियों की गिरफ्तारी तो अस्थाई उपाय है। क्या संघ परिवार अपनी विचारधारा को इतना फैला सकेगा जिससे भाजप (उसमें बहोत से सुधीन्द्र कुलकर्णी जैसे लोग होंगे ही)या गेरभाजप दलों को, मिडिया, अध्यापन, साहित्य और कला कोई भी क्षेत्र अछूता न रह पाये?

Tuesday, August 14, 2018

यजुर्वेद में है दुनिया का सब से प्राचीन राष्ट्रगान

सौजन्यः आंतरजाल (इन्टरनेट)

आ ब्रह्मन्‌ ब्राह्मणो ब्रह्मवर्चसी जायतामा राष्ट्रे
राजन्यः शूरऽइषव्योऽतिव्याधी महारथो जायतां
दोग्ध्री धेनुर्वोढानड्वानाशुः सप्तिः पुरन्धिर्योषा जिष्णू
रथेष्ठाः सभेयो युवास्य यजमानस्य वीरो जायतां
निकामे निकामे नः पर्जन्यो वर्षतु फलवत्यो
नऽओषधयः पच्यन्तां योगक्षेमो नः कल्पताम्‌॥
-यजुर्वेद २२.२२

हम किसी और पंथ के  पवित्र ग्रंथ की बात नहीं कर रहे हैं। लेकिन यह तो कोई भी स्वीकार करेगा कि सनातन धर्म भारत में उत्पन्न हुआ और सनातनी यानि हिन्दू अपने आप को भारत की संतति मानते है। दुनिया के सब से प्राचीन पवित्र ग्रंथ जो स्वंय ब्रह्माजी द्वारा रचित है एसे वेदों में राष्ट्रगान दिया हुआ है। यजुर्वेद में दुनिया का सब से प्राचीन राष्ट्रगान मिलता है। यानि वंदे मातरम् से भी प्राचीन गान।  इस ऋचा से यह बात का भी खंडन होता है कि भारत मुस्लिम और इसाई (ब्रिटिश-पॉर्तुगली) आततायीयों के पहेलें एक राष्ट्र नहीं था।

यजुर्वेद में ऋषि प्रार्थना करता है कि

"हे भगवान! हमारे राष्ट्र में ब्रह्म तेज से तेजस्वी ब्राह्मण (अर्थात् जो ब्रह्मज्ञान को पाने का उत्सुक हो, ये जातिवाचक शब्द नहीं) उत्पन्न हो। हमारे राष्ट्र में शूरवीरो, धनुर्धारी, शत्रुओं को परास्त करनेवाले महारथी क्षत्रिय (फिर से, यह जातिवाचक नहीं, जो भी राष्ट्र की रक्षा करने को तत्पर हो) उत्पन्न हो। हमारे राष्ट्र में बहोत सारा दूध देनेवाली गायें हो, बैल बलवान हो, घोडें शीघ्रगामी हो। हमारे राष्ट्र में नारियां विनयशील व संस्कारी हो। हमारे राष्ट्र में रथ में बैठनेवाले वीर विजयशील हो। हमारे राष्ट्र में यजमान को वीर और सभा में बैठने योग्य पुत्र (ज्यादातर भारतीय भाषाओ में सरलता के लिए संतान, चाहे पुत्र हो या पुत्री हो, पुत्र और पुल्लिंग प्रयोजा जाता है) उत्पन्न हो।

हमारे राष्ट्र में जब जब हम प्रार्थना करे तब तब वर्षा हो। हमारे राष्ट्र में फल से भरपूर वनस्पति-औषधियां उत्पन्न हो। हम सब का योगक्षेम उत्तम स्वरूप से संपन्न हो।

यानि ऋषि अपने लिए कुछ न मांगकर, भारतवर्ष  राष्ट्र में रहनेवालों के लिए मांग रहे है। उन्हों ने प्रार्थना की है कि यहां ब्रह्म विद्या जाननेवाले तेजस्वी लोग हो। राष्ट्र की रक्षा आवश्यक है। इसी लिए शत्रुओ को परास्त करनेवाले शूरवीर भी मांगे है। हम कितने भी आध्यात्मिक हो, हमारी निम्नतम कुछ न कुछ भौतिक आवश्यकताएं रहती ही हैं। इस से ऋषि ने मुंह नहीं मोडा है। हां, यह सत्य है कि भौतिक आवश्यकताओ में रचे बसे रहना नहीं चाहिए। लेकिन कुछ तौ भौतिक आवश्यकताएं पूरी होनी ही चाहिए। इसी लिए ऋषि मांगते है कि भरपूर दूध देनेवाली गायें हो। कृषि भी भौतिक आवश्यकता है और प्राचीन समय में कृषि बैल के बिना कल्पित नहीं थी। इसी लिए बलवान बैल की कामना की गई है। वाहन व्यवहार भी अनिवार्य है। इस लिए तेज गति से दोड सकें एसे घोडें भी मांगे गये है।

इस के बाद नारियां विनयशील व संस्कारी हो एसी कामना की गई है। यहां कोई नारीवादी (फेमिनिस्ट) प्रश्न कर सकता है कि केवल नारियां ही क्यों? नर क्यों नहीं? इस का उत्तर यह है कि आगे जाकर नर के लिए भी मांगा ही गया है। लेकिन यह भी बात सत्य है कि कोई भी संतति हो, उस को संस्कार अपनी माता से ही मिलते है। अंग्रेजी में भी कहावत है कि The Hand That Rocks the Cradle Is the Hand That Rules the World। 

इस के आगे चलकर यजमान के घर वीर और सभा में बैठने योग्य पुत्र हो एसी ईश्वर से कामना की गई हैं। यहां पुत्र- पुत्र और पुत्री दोनों का प्रतिनिधित्व करता है। यजमान माने जो धर्म के अनुसार आचरण करनेवाला हो। जो यज्ञादि कर्म करता हो। करवाता हो। उस के घर में वीर संतति हो। और सभा में बैठने योग्य का तात्पर्य ये है कि प्राचीन समय में सभा में बैठने की योग्यता यही थी कि जो संस्कारी है, बुद्धिमान है, सभ्य है। तो सज्जनों के घर वीर, संस्कारी, सभ्य और बुद्धिमान संतति हो एसी ऋषि कामना करतें है। तो इस के पहेले के परिच्छेद में ऋषिने माताओं के लिए कामना की थी। यहां उनकी संतति के लिए कामना की हैं।

हम वेदों को भूल गये हैं। इसी लिए अशोक के बाद विजय की ईच्छा-महेच्छा भूल गये हैं। इस प्रार्थना में कहा गया है कि हमारे राष्ट्र में जिष्णू यानि जीतने की ईच्छा - विजय की ईच्छा रखनेवाले महारथी उत्पन्न हो। 

हमारे राष्ट्र में आवश्यकता अनुसार (न अल्प, न अति) बारिश हो। हमारे राष्ट्र में वनस्पति-औषधियां फल से भरपूर हों। इस तरह ऋषि औषधियों और अन्न के लिए किसी दूसरे राष्ट्र पर अवलंबित न रहना पडे, एसी कामना करतें है। 

अंत में ऋषि कामना करते हैं कि हमारे राष्ट्र में सब का योगक्षेम सुचारु रूप से संपन्न हो। यानि प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदीजी का  'सब का साथ सब का विकास' मंत्र तो वेदों में सब से पहले दे दिया था। सब का साथ सब का विकास मंत्र का मूल यहां छिपा हुआ है। 

इस प्रकार ११ कामना या सूत्र से ऋषि राष्ट्र के लिए प्रार्थना करतें हैं।

मेरे विचार से, इस राष्ट्रगान का उत्तम स्वरांकन कर के और इसे ही राष्ट्र गान के रूप में स्वीकार करने के बारे में चर्चा होनी चाहिए। 



Thursday, August 9, 2018

एससी-एसटी कानून: नरेन्द्र मोदी का राजीव गांधी मॉमेन्ट?

सौजन्य: indiatvnews.com

क्या एससी एसटी संशोधन विधेयक पारित करवाना नरेंद्र मोदी का राजीव गांधी मॉमेन्ट है? यह प्रश्न बिल्कुल समयोचित है क्योंकि एससी-एसटी संशोधन विधेयक सर्वोच्च न्यायालय के आदेश को निरस्त करने के लिए मोदी सरकार द्वारा पारित किया गया है।

यह मोदी सरकार द्वारा दलित संगठनों द्वारा हो रहे आंदोलन के दबाव के कारण और आने वाले २०१९ के लोकसभा चुनाव में दलित मत को प्राप्त करने हेतु उठाया गया कदम है। हालांकि कॉंग्रेस और वामपंथी फिर भी इस कदम की आलोचना कर मोदी सरकार को दलित विरोधी प्रस्तुत कर रहे हैं। उनका कहना है कि भाजप द्वारा शासित राज्यों में दलित विरोधी अत्याचार बढ़े हैं।

हालाकि यह छवि इसलिए बन गई है क्योंकि भाजप द्वारा शासित राज्यों की संख्या बड़ी है। और मीडिया का फोकस भी भाजप शासित राज्य ज्यादा रहते हैं और कॉंग्रेस जिसका अभी एक ही राज्य पंजाब में शासन मुख्य रूप से बचा है वहां और वामपंथी द्वारा शासित केरल में हो रहे दलित पर अत्याचार मीडिया में जोरशोर से नहीं दिखाए जाते। इसी तरह से पश्चिम बंगाल में भी ममता बनर्जी के शासन में दलितों पर हो रहे अत्याचार दिखाई नहीं पड़ते। इसी कारण दलित संगठन तथा विपक्ष मोदी सरकार को दलित विरोधी पेश करने में सफल रहे हैं और इसी दबाव में मोदी सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए आदेश को निरस्त करने हेतु एससी एसटी संशोधन विधेयक पारित करवाया है।

सर्वोच्च न्यायालय ने यह आदेश क्यों दिया था? सर्वोच्च न्यायालय ने अपने आदेश में गत २० मार्च को कहा था कि एससी एसटी कानून का राजकीय या व्यक्तिगत रूप से स्थापित हितों द्वारा दुरुपयोग हो रहा है ऐसी शिकायतें बढ़ गई है। यह पहली बार नहीं था कि किसी न्यायालय द्वारा ऐसा आदेश दिया गया था। इससे ५ वर्ष पूर्व १२ मार्च २०१३ को केरल उच्च न्यायालय द्वारा ऐसा आदेश दिया गया था कि किसी भी व्यक्ति को दलित या आदिवासी पर अत्याचार के लिए तब तक दोषित नहीं ठहराया जा सकता जब तक ऐसा साबित ना हो कि ऐसा वंशीय पूर्वाग्रह से किया गया था।

तमिलनाडु में पीएमके नाम का पक्ष दलित तरफी है और तत्कालीन मुख्यमंत्री जयललिता ने इसके नेता रामदोस पर आरोप लगाया था कि दलितों को उकसाकर पीएमके के कार्यकरो ने गरीबों के झोपड़े जलाये थे। दलित तरफी कहे जाने वाले इसी रामदोस ने कहा था कि एट्रोसिटी कानून का काफी दुरुपयोग हो रहा है। अपने राजनीतिक प्रतिद्वंदी को खामोश करने के लिए इस कानून का सहारा गलत तरीके से लिया जा रहा है।

'Why I am not Hindu' नाम की किताब लिखने वाले दलित बुद्धिजीवी कांचा इलैया ने भी आरोप लगाया था कि भाजप ने अपने एक दलित सांसद के द्वारा उनके विरुद्ध एट्रोसिटी कानून के तहत झूठा केस करवाया था।

पिछले दिनों संसद में प्रस्तुत किए गए अविश्वास प्रस्ताव पर हुई चर्चा के दरमियान रामविलास पासवान जो कि एक दलित नेता है और एनडीए में शामिल है उन्होंने कहा था कि मायावती जब उत्तर प्रदेश में शासन में थी तब उन्होंने आदेश दिया था कि एट्रोसिटी कानून के अंतर्गत हुई शिकायत पर जल्दी से कार्यवाही ना की जाए क्योंकि वह झूठी शिकायत हो सकती है। कोई ताकतवर व्यक्ति द्वारा दलित को उकसाकर ऐसी शिकायत करवाई जा सकती है। उन्होंने ऐसा आदेश भी दिया था कि बलात्कार की रिपोर्ट द्वारा पुष्टि होने पर ही एससी एसटी कानून तहत कार्यवाही हो।

अब सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पिछले मार्च में दिए गए आदेश पर वापस चलते हैं। क्या सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिया गया आदेश अपनी मन मर्जी के मुताबिक था? नहीं। सर्वोच्च का आदेश एक संसदीय समिति द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट पर था और इस समिति में भाजपा के १३ दलित और आदिवासी सांसद थे। इसमें कांग्रेस के भी पांच सांसद सदस्य थे। और तो और सीपीएम, असऊद्दीन ओवैसी तृणमूल कांग्रेस, बीएसपी, एनसीपी, शिवसेना आम आदमी पार्टी आदि सभी विपक्षी दल के भी सांसद उसमें थे। कुल ३० सदस्यों की इस समिति में १७ सांसद विपक्ष के थे यानी कि विपक्ष का बहुमत था!

सर्वोच्च न्यायालय ने अपने आदेश में कहा था कि समिति की रिपोर्ट को ध्यान में रखते हुए अनुच्छेद २१ के तहत संवैधानिक गैरंटी के अमल के लिए सुरक्षात्मक उपाय जरूरी है जिससे आपखुद गिरफ्तारी या ग़लत involvement के सामने लोगों की सुरक्षा की जा सके।

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो द्वारा प्रस्तुत आँकड़ों के संबंध में विचार करने पर ज्ञात होता है कि अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति अधिनियम में दर्ज ज़्यादातर मामले झूठे पाए गए।

न्यायालय द्वारा अपने फैसले में ऐसे कुछ मामलों को शामिल किया गया है जिसके अनुसार २०१६ की पुलिस जाँच में अनुसूचित जाति को प्रताड़ित किये जाने के ५३४७ झूठे मामले सामने आए, जबकि अनुसूचित जनजाति के कुल ९१२ मामले झूठे पाए गए।

लेकिन सभी पक्षों के सांसद जिसमें सदस्य थे ऐसी संसदीय समिति की रिपोर्ट के आधार पर सर्वोच्च न्यायालय का जैसे ही आदेश आया कि कांग्रेस समेत विपक्षी दल ने इसे मुद्दा बना दिया और ऐसी हवा बना दी कि मोदी सरकार  सर्वोच्च के जरिए इस कानून को खत्म करना चाहती है। मोदी सरकार भी चुनाव को देखते हुए पीछे हट गई और संसद में सर्वोच्च न्यायालय के आदेश को पलटने के लिए संशोधन विधेयक पारित करवा दिया। यह ऐसी ही बात है जैसे राजीव गांधी सरकार ने कट्टरपंथी मुस्लिमों को खुश करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय द्वारा ६२ वर्षीय  मुस्लिम वृद्धा शाहबानो को उसके पूर्व पति द्वारा निर्वाह-व्यय के समान जीविका देने के आदेश को निरस्त करने के लिए संसद में संशोधन विधेयक पारित करवाया था। उस समय से लेकर आज तक भाजप इसे कांग्रेस द्वारा खेला गया वॉट बैंक पॉलिटिक्स बताती है। लेकिन प्रश्न तो अब भाजप के सामने भी उठेगा कि अभी जो उसने संशोधन विधेयक पारित करवाया उसे क्या वॉट बैंक पॉलिटिक्स नहीं कहा जाएगा?

Thursday, May 31, 2018

कैराना व अन्य उपचुनाव के परिणाम क्या दर्शाते हैंॽ

जयवंत पंड्या
आज कल पूर्व हिन्दू हृदय सम्राट और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी रमजान की उर्दू में शुभकामना दे रहे है। (शुभकामना का विरोध नहीं है, भाषा का है), प्रेमचंद मुन्शी की ईदगाह का उल्लेख करने लगे है। गुजरात सरकार ने भी हिन्दूवादी का थप्पा न लगे इस लिए पर्जन्य यज्ञ करने का निर्णय वापस लिया। अजान के समय अपना भाषण रोक देना ये भी मोदी-शाह करने लगे है। ये सभी का विरोध नहीं है। विरोध इस बात का है कि जब कॉंग्रेस या अन्य विपक्ष के लोग करते थे तो भाजपवाले इसे अल्पसंख्यको का तुष्टिकरण बताते थे।

कर्णाटक में प्रशांत पूजारी समेत २३ हिन्दूओ की हत्या का मुद्दा न चला क्योंकि चुनाव  के समय ही उठाया, पहले उठाया नहीं। चुनाव के लिए बाकी रखा।(पश्चिम बंगाल और केरल में भी यही हो रहा है)
कैराना में भी हिन्दूओ के पलायन का मुद्दा जोरशोर से उठाने के बाद पीछे  हट गये।

क्या हिन्दू ये नहीं समजते होगेॽ भाजप भूल रहा है कि २००४ में आडवाणी ने भी सेक्युलर होने की कोशिश की थी। इन्डिया शाइनिंग के नाम पर विकास के प्रचार की आंधी थी। विकास सचमुच अच्छा हुआ था। (सडक, जीडीपी,  पोखरण जैसे अनेक मुद्देसभाजप के पक्ष  में थे।) २००२ में महंत फरमहंस रामचंद्र और विहिप के विरुद्ध सुरक्षा दल खडे कर दिये थे। परिणाम क्या हुआॽ २००४ में हार गये। २०१९ में भी एसा हो सकता है।

पीछली २० मई को दिल्ली की मेरी एक दिवसीय यात्रा से मैं लौट रहा था। पहाडगंज स्टेशन की ओर से प्रवेश कर रहा था। वहां एस्केलेटर की अच्छी सुविधा है। प्लेटफॉर्म १ का सुधारकाम चल रहा था। गाडी प्लेटफॉर्म ३ पर आनेवाली थी। एस्केलेटर से जाने के लिए गया। लेकिन एस्केलेटर उपर जाने के लिए बंद! नीचे आनेवाला एस्केलेटर शुरू। एक मुस्लिम बुजुर्ग मुश्किल से एस्केलेटर पर सामान के साथ चड रहे थे। मैने सोचा, बुजुर्ग है, रमजान भी है। चलो सहाय की जाये। मैने चाचा से कहा,  लाओ ये थैला मैं उठा लूं। चाचा स्वावलंबी थे। बोले, शुक्रिया बेटा। मैं उठा लूंगा। ये कर्णाटक में हार का गुस्सा है।

ये एक सामान्य मुसलमान की सोच है। १९ मई को कर्णाटक विधानसभा में हार हुई इस लिऐ नई दिल्ली का चडनेवाला एस्केलेटर बंध रखा जाये एसा कोई सरकार क्यों करेगीॽ हालांकि एसी सोच बनाने में मिडिया का भी प्रदान है। कर्णाटक चुनाव के बाद पेट्रोल-डीजल के दाम बढने के समाचार का शीर्षक एक गुजराती पत्र में एसा था- कर्णाटक की हार का गुस्सा। एसा गुस्सा सरकार क्यों करेगी भलाॽ क्या वो नहीं जानती होगी कि हमारे इस कदम से हमारे मतदाता हम से रूठ जायेंगेॽ

दूसरा ये भी कि भाजप कांग्रेस की राह पर चल रहा है। कर्णाटक के चुनाव के समय पेट्रोल - डीजल के दाम बढने नहीं दीये। ये बूमरेंग हुआ। कर्णाटक का चुनाव तो हो गया और अपेक्षाकृत परिणाम नहीं  आये। लेकिन इस के बाद कई दिनों तक दाम निरंतर बढने दीये। नतीजा ये हुआ  कि मोदी सरकार के चार वर्ष के मूल्यांकन पर पेट्रोल - डीजल के बढे हुए दाम छाये रहे।

तात्पर्य ये कि भाजप चाहे जितना सेक्युलर हो ले, सामान्य मुसलमान के मन में अभी भी टीस या नफरत है ही। वो कभी भाजप को मत नहीं देंगे। सेक्युलर होने के चक्कर में भाजप हिन्दू मतदाता को भी गंवा देगा। हिन्दू मध्यम वर्गीय मतदाता  वैसे भी अपनेआप को ठगा अनुभव करता है। २०१४ के चुनाव में भले भाजप या मोदी ने सीधेसीधे वचन न दीया हो, लेकिन बाबा रामदेव का 'आप की अदालत'वाला विडियो जो आज वाइरल है उस में रामदेव दर्शको से पूछते है कि आप को कैसा प्रधानमंत्री चाहिएॽ पेट्रोल के दाम ३५ कर दें एसा या ७२ कर दे एसाॽ रामदेव ने आय कर समाप्त करने की भी बात की थी। काला धन वापस लाने का भी कहा था। ये सब छोडो, आय कर सीमा कुछ विशेष नहीं बढ़ी।एफडी,  स्मोल सेविंग स्कीम पर ब्याज दर निरंतर घट रहे हैं। नौकरी कर रहे लोगो के वेतन में विशेष बढौती नहीं हुई। और अब, हिन्दूत्व को भी भाजप हांसिये पर कर रहा है।

परिणाम ये हो सकता है कि हिन्दू के मत भी न मिले और अन्य पंथ के भी न मिले। अर्थात् कर्णाटक का पुनरावर्तन  समूचे देश में हो सकता है। 

Monday, December 11, 2017

GUJARAT ELECTION - 2017 : SWORDS DRAWN

Though, the Gujarat Assembly election are like any other elections but with every passing day many twists and turns have made it rather too interesting. There is no talk of 2002 riots, the issues of demonetisation and GST are also taking a backseat and in Gujarat after a long time ‘caste’ is made into a central issue to break the BJP’s stronghold.  Rahul Gandhi has made it virtually a battle for his survival as a credible leader for which he is openly allying with the contradictory caste leaders, even at the cost of upsetting the Congress workers. On the other hand, Prime Minister Nerendra Modi and the organisational machinery under the leadership of Amit Shah are not keeping any stone unturned to keep hold over the bastion.
The BJP is trying its best to keep the elections to Development Vs Dynastic Politics, while the Congress besides caste factor, has been trying to be a soft-Hindutva party with unprecedented temple visits by the President in waiting. While everyone was thinking Gujarat to be a battle of nerves, Prime Minister Modi hitting the ground zero has suddenly changed the mood. The self-goals by Congress are coming handy in this regard.

Playing with the Fire 
The picture is getting clear with the filing of nominations and the uneasiness between Congress and the Hardik Patel led Patidar Anamat Andolan Samiti (PASS) is getting sharper. Congress by agreeing to 20 percent reservation formula of PAAS may affect some voters but whether it is feasible on Constitutional parametres, experts have doubts. Interstingly, Hardik Patel himself declared support to the Congress for accepting his reservation formula but when he announced this no Congress leader was accompaning him.
Even electorally this tacit turned open alliance is not going very smooth. The Congress gave tickets to some PAAS conveners without prior approval of PAAS’s top leadership, so PAAS leaders like Dinesh Bambhaniya had to rush to the Congress state president. At the same time, PAAS workers were attacking Congress’s candidate Prafull Togadia. Due to opposition from PAAS, the Congress had to change not only Prafull Togadia (Varachha road, Surat) but also other three seats including that of Nilesh Kumbhani (Kamrej, Surat) and Amit Thummar (Junagadh).
The aggression of PAAS workers further increased the discomfort among the Congress Cadre.
 Patidars are asking questions to PAAS leaders why they want to support only the Congress? Patidars have been reminded of so-called atrocities of police in 2015 by Hardik but the community had not forgotten that more than 100 persons were killed in riots during the Madhavsinh Solanki led Congress rule. So they are questnioning Hardik’s intent now.
The Congress has also offered a free way to Jignesh Mewani, a Dalit leader who has a goal to defeat BJP not only in this election but in coming Lok Sabha elections too. Jignesh is contesting from Congress’s safe seat Vadgam as an independent candidate.
Now that Hardik, Alpesh and Jignesh are with Congress publically, voters are rethinking supporting these three leaders. Alpesh Thakor’s candidature from Radhanpur is being opposed by none other than Congress local workers. Congress has allied with tribal leader Chhotu Vasava who helped Ahmed Patel winning Rajya Sabha election and gave five seats to him but local leaders of Congress are opposing this.
The Congress State president Bharatsinh Solanki is also reportedly upset with the high command as his his supporters were not given tickets. All in all, this circus of riding on many horses by Rahul Gandhi is turning out to be a storm in a teacup.

Subtle Communalism
Though Rahul Gandhi is visiting every possible prominent temple in Gujarat, may be taking a clue from A K Antony report after 2014 Lok Sabha elections that clearly stated that Congress is perceived to be inclined towards minorities and therefore against Hindus. Still, subtle communal card is being played from the backdoor.
There are two controversial letters circulating in social media. One is from Sikandarkhan U. Pathan in the name of ‘Jagrut Laghumati Yuvak Mandal’. The letter says that our community has been always loyal to the nation. Despite this, the BJP runs a vicious campaign against us. We are being considered as terrorists, anti-national and Pakistani.
The second letter is from Archbishop Thomas Mackwan. The letter is written in the name of ‘Archdiocese of Gandhinagar’ giving a call to defeat the ‘nationalist’ forces. Congress has not taken any stand on this.
The Archbishop has not clearly appealed against BJP but his indication is clearly against BJP and by using nationalist forces for BJP he has put his community in the anti-national bracket. Not only that, he proved once again churches have been never apolitical.
To add to this, the Congress has given instructions to the Muslim voters not to appear with beard, skull cap and burqa! Congress minority cell meeting was organised in the presence of National President Khurshid Saeed and State President Gulabkhan Raoma instructed thus. This has irked the Muslims too! Some Muslims, including an ex-president, opposed this, demanding more seats for Muslim candidates.

Rahul a Hindu?
Already a controversial visit of Rahul Gandhi to Somnath Temple, which was opposed by his great-grandfather Jawahar Lal Nehru, further created a discomfort in the congress camp. At a register kept at Somnath Temple meant exclusively for non-Hindus to register their names while entering inside temple premises, Rahul Gandhi's name was entered, along with the name of Sonia Gandhi’s political secretary Ahmed Patel. This may be an inadvertent or deliberate error by the state media coordinator, as the Congress Vice President himself did not sign the register as per the temple trust version, it is good enough to bring back his identity issue in elections.
While the Congress has been trying to raise a storm as if it is do-or-die for it in the Gujarat elections, Prime Minister Narendra Modi joined the campaign trail with full vigour from November 27 with four rallies in a day.

Modi Mania Continues 
He launched carpet bombing by exposing Congress’s anti-Gujarat and anti-Gujaratis stand. He alleged Congress had done injustice not only to Sardar Patel, but one of the finest finance minister Morarji Desai too. Congress is all about one family saga. While Doklam issue was burning, Rahul Gandhi was hugging China ambassador. Even after the surgical strike, the Congress and other opponents had asked for evidence. He said demonetisation and GST were for benefit of country and will continue to pursue black money holders. Raising the questions on Congress’s development rack record, he contrasted dams and drinkable water to all with the hand pump politics of the grand old party.
Reminding the opposition of what the then Prime Minister Nehru did to the Somnath Temple, Prime Minister exposed the intent of Rahul Gandhi visiting the revered temple. His rallies, especially at Patidar stronghold Morbi, were with electrifying effect. His excellent communication in Gujarati and connect with the local issues is still has the same current. Prime Minister is complemented by other BJP leaders including the UP Chief Minister Yogi Adityanath.


‘Tea-Seller Jibe’

In 2014, the ‘Chaiwala’ remark by senior Congress leader Mani Shankar Aiyar that was turned into a popular interactive programme ‘Chai Pe Charcha’ by Modi and his team. It seems, the youth Congress completely forgotten this boomerang and revived the ‘tea-seller’ jibe with a derogatory remark against The resurgence of Prime Minister Narendra Modi's image as a "tea-seller", thanks to the Congress, has come in handy to the BJP.  It received a further boost when US President Donald Trump's daughter Ivanka also echoed it in Hyderabad saying “from your childhood selling tea to becoming prime minister, you've proven that transformational change is possible.”
“Yes, I sold tea, but (I) did not sell the nation” was the Modi’s reply to the tea-seller jibe.
People in Gujarat have seen the real transformation in last few decades. Prior to 2002, Gujarat saw widespread rioting every now then. The entreprenurial community of Gujaratis has found peaceful atmosphere under BJP rule and the party is conveying this very effectively. Whether in terms of providing drinking water or taking 24X7 electricity supply to the household, Gujarat is a stand alone example. On the parametres of business friendly atmosphere also it is doing really well. Therefore, against the ‘Development has gone mad’ of Congress, BJP’s ‘I am Gujarat, I am Development’ campaign is touching the positive cord with the people.
If the pre-poll predictions and the indicators in the betting market are to be believed, BJP clearly has an edge in this election despite 22 years interrupted rule. Whether Gujarat chooses for ‘Fakir Gandhi’ or dynastic Gandhi, as remarked by the PM, will be clear on the counting Day of December 18 but as of now it looks that the continued Modi mania and efficient organisational structure that is going to be the differentiating factor in favour of BJP.   
    (with Organiser Bureau)

Gujarat Model of Development

 With only 6 per cent of India's land mass and barely 5 per cent of its population, Gujarat has managed to account for 7.6 per cent of the country's GDP and 22 per cent of its exports.
Its annual Gross State Domestic Product (GSDP) growth from 2001 to 2013 (growth has slowed down since) averaged nearly 10 per cent, which is faster than the national growth.
In the last two decdes, Gujarat grew at an average rate of 5.1 per cent. If Gujarat were a country with a 10 million-plus population, this would be the third-fastest growth rate in the world, after China and South Korea.
Gujarat has been among the fastest growing states even in the past. Despite poor rainfall, it has made strides in agriculture. Unlike Punjab and Haryana, states which launched the first Green Revolution with government support, Gujarat's agricultural transformation came via the market route.
A milk revolution and largescale exports of fish accompanied the growth in horticulture and sharp increase in agricultural productivity. The agricultural turnaround-with growth rates as high as 11.1 per cent between 2000 and 2013-was accomplished despite water scarcity.

In his brisk campaign in Saurashtra region he reminded people of the transformation brought out by the BJP. “Whatever Gujarat has today is all due to BJP. The result of development brought in by Modi Ji, when he was CM, can be seen today. Bhuj was destroyed in earthquake & is flourishing. Narmada’s water is now available everywhere in the state. Congress and Rahul must see this,” said Adityanath.  

Monday, November 27, 2017

गुजरात विधानसभा चुनाव - २०१७ -हारेगा जातिवाद जीतेगा राष्ट्रवाद

(मेरा यह लेख पांचजन्य के २६-११-१७ के अंक में प्रकाशित हुआ)

कर्णावती से जयवंत पंड्या,  साथ में दिल्ली ब्यूरो
गुजरात में चुनावी सरगर्मी जोरों पर है। दोनों ही मुख्य दलों (भाजपा और कांग्रेस) के दिग्गज चुनाव प्रचार में लगे हैं। जहां भाजपा अपनी सरकार के विकास कार्यों और गुजराती अस्मिता के  नाम पर वोट मांग रही है, वहीं कांगे्रस जाति के नाम पर लोगोें को अपने साथ जोड़ने की कोशिश कर रही है और हिंदुओं को यह संदेश देने की कोशिश कर रही है कि अब वह मुस्लिम तुष्टीकरण की राह पर नहीं है। इस सोच को पुख्ता करने के लिए राहुल गांधी आश्रमों, मठों और मंदिरों के चक्कर लगा रहे हैं। लेकिन गुजरात के लोगों का मानना है कि इन सबसे कांग्रेस के पाप नहीं धुलेंगे। उसने पूरे देश में तुष्टीकरण की राजनीति करके अनगिनत पाप किए हैं। गुजरात के लोग कांग्रेस के इन पापों से कई दशक तक परेशान रहे हैं। कर्णावती के मयंक व्यास कहते हैं, ‘‘एक समय कांग्रेस ने तुष्टीकरण की राजनीति करके गुजरात को कर्फ्यू प्रदेश बना दिया था। आए दिन कहीं न कहीं कर्फ्यू लगता था। भाजपा ने इस प्रदेश को कर्फ्यू से बाहर निकालकर विकास के पथ पर आगे बढ़ाया है।’’ 

ऐसी सोच रखने वालों की कोई कमी नहीं है। गांधीनगर के सुरेश पटेल कहते हैं, ‘‘कांग्रेस ने गुजरात को पीछे धकेलने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। यही नहीं, जब नरेंद्र मोदी मुख्यमंत्री थे तब कांग्रेस ने गुजरात के विकास में रोड़ा अटकाने में कोई हिचक नहीं दिखाई थी। उसने बड़ी बेशर्मी के साथ विकास योजनाओं को रोकने का काम  किया था। इसका ज्वलंत उदाहरण है नर्मदा योजना।’’ उल्लेखनीय है कि तत्कालीन केंद्रीय जल संसाधन मंत्री सैफुद्दीन सोज ने अनुचित हस्तक्षेप कर नर्मदा नदी पर बनने वाले सरदार सरोवर बांध की ऊंचाई बढ़ाने का काम अटका दिया था। इस मामले में कांग्रेस के नेता अभी भी झूठ बोल रहे हैं। अभी कुछ दिन पहले पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह गुजरात में थे। उन्होंने खुलेआम कहा कि तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी नर्मदा के मुद्दे पर कभी उनसे मिले ही नहीं। इस झूठ से भी गुजरात के लोग नाराज हैं, क्योंकि इस बात के साक्ष्य हैं कि मोदी ने 2006 और 2013 में नर्मदा मुद्दे पर मनमोहन सिंह से बातचीत की थी। लेकिन केंद्र सरकार ने उनकी एक नहीं सुनी। जब मोदी खुद प्रधानमंत्री बने तब उन्होंने नर्मदा बांध की ऊंचाई को बढ़ाने की अनुमति दी थी। आज उस बांध के पानी से गुजरात में विकास के नए अध्याय लिखे जा रहे हैं। मोदी ने महाराष्टÑ और दिल्ली के बराबर गुजरात को गैस के दाम न देने के लिए भी मनमोहन सिंह के समक्ष अपना विरोध जताया था। उस समय महाराष्ट्र और दिल्ली दोनों जगहों पर कॉंग्रेस की सरकारें थीं। 

तत्कालीन केंद्र सरकार के विरोध और बाधाओं के बावजूद गुजरात सरकार ने राज्य के विकास के लिए अनेक काम किए हैं। जनता भी इस बात को महसूस करती है। सौराष्ट्र-कच्छ में नर्मदा का पानी पहुंचाया गया, दाहोद में एशिया का सबसे बड़ा पेट्रोकेमिकल्स संयंत्र लगाया गया, भरुच के पास भारत का सबसे बड़ा केबल ब्रिज बना, घोघा-दाहोद के बीच रॉ-रॉ फेरी सेवा शुरू की गई, लोगों को 24 घंटे बिजली मिल रही है, गांवों से लेकर शहर तक अच्छी सड़कें बनी हैं, और सबसे बड़ी बात है गुजरात में कानून-व्यवस्था का अच्छा होना। अपराधी तत्वों और आतंकवादियों के विरुद्ध सख्त कार्रवाई की गई है। वडोदरा में रहने वाले 60 वर्षीय जीतू भाई कहते हैं, ‘‘कांग्रेस के काल में माफिया और तस्कर पुलिस पर भारी पड़ते थे। उन तत्वों की पहुंच मुख्यमंत्री आवास तक होती थी। ये तत्व व्यापारियों को निशाना बनाते थे। इसलिए उन दिनों सैकड़ों व्यापारी गुजरात छोड़कर मुंबई चले गए थे। भाजपा सरकार ने इन तत्वों को खत्म किया है। इसलिए गुजरात में शांति है।’’ 

गुजरात के लोगों को 2002 के दंगों से पहले के दंगे भी अच्छी तरह याद हैं। कांग्रेस के मुस्लिम तुष्टीकरण ने राज्य को पूरी तरह अशांत बना दिया था। साल के 365 दिन में से लगभग 200 दिन कहीं न कहीं कर्फ्यू लगा रहता था। यह भी कहा जाता था कि गुजरात के बच्चे ‘मां’ बोलना सीखने से पहले ‘कर्फ्यू’ बोलना सीख जाते थे। यहां छबीलदास महेता की सरकार (जो कि गुजरात में कांग्रेस की अंतिम सरकार थी) के समय की एक घटना का उल्लेख करना जरूरी है। चर्चित पुलिस अधिकारी डी. जी. वणझारा ने उस समय के कुख्यात तस्कर इभला शेठ को पकड़ा था। लेकिन गांधीनगर के आदेश के बाद उसे छोड़ दिया गया था और बतौर सजा वणझारा का स्थानांतरण कर दिया गया था। महेता सरकार के तत्कालीन गृह मंत्री नरेश रावल ने सार्वजनिक रूप से कहा था, ‘‘यह सरकार असामाजिक तत्वों द्वारा चलाई जा रही है।’’

गुजरात की जनता काफी चतुर और समाधानवादी मानी जाती है। लेकिन अगर कोई उसे छेड़ता है तो वह उसे छोड़ती भी नहीं है। 2002 में गोधरा नरसंहार के बाद भड़के दंगों को लेकर गुजरातियों को पूरी दुनिया में बदनाम कर दिया गया। ऐसा कहा गया कि दंगों में केवल और केवल मुसलमान मारे गए, जबकि मरने वालों में हिंदू भी थे। कुछ तथाकथित समाजसेवियों ने दुनिया के अनेक देशों में घूम-घूमकर गुजरात के हिंदुओं को ‘मानवभक्षी’ तक कहा था। गोधरा में जिंदा जलाए गए हिंदुओं के बारे में तो पूरी तरह चुप्पी साध ली गई थी। उसी तरह 2007 में अपराधी सोहराबुद्दीन की मुठभेड़ में हुई हत्या को लेकर भी गुजरात को बदनाम किया गया। उसे ‘बेचारा’ बताकर सर्वोच्च न्यायालय तक लड़ाई लड़ी गई। किसी ने उसके आतंक को जानने की कोशिश नहीं की। आतंकी इशरत जहां के मामले में भी गुजरात को बदनाम किया गया। खुफिया एजेंसियों की रपटों को दरकिनार कर उसे ‘निर्दोष’ बताया गया। 

इन सबसे गुजरात के लोगों में गुस्सा बढ़ा और उन्होंने बदनाम करने वालों को पंचायत से लेकर विधानसभा चुनावों तक में पटखनी दी। गुजरातियों की एकता को तोड़ने के लिए ही कांग्रेस ने इस बार जातिवाद की राजनीति शुरू की है। इसी के तहत उसने पाटीदार नेता हार्दिक पटेल, पिछड़े वर्ग के नेता अल्पेश ठाकोर और वंचित समाज से आने वाले और सोच से वामपंथी जिग्नेश मेवाणी को अपने साथ लिया है। लोगों का मानना है कि ये तीनों कांगे्रस की शह पर ही पिछले कुछ साल से गुजरात की भाजपा सरकार के विरुद्ध आंदोलन कर रहे हैं। अब यह स्पष्ट दिखने भी लगा है। इसलिए गुजरातियों को सब कुछ समझ में आने लगा है। तूफानी चुनावी प्रचार के साथ ही गुजरातियों की यह समझ और परिपक्व होती जा रही है। इसलिए लोग कहने लगे हैं कि जातिवाद हारेगा और राष्टÑवाद जीतेगा।    

Gujarat tourism: Spread culture with tourism


(This article was published in Organiser Magazine dt. 03 December 2017).

Gujarat and Gujarati loves tourism. I mean to say Gujarat is great center of tourism and Gujaratis are great tourists who visit from Char Dham to Kanyakumari and from US to Thailand. But until Narendra Modi became chief minister and he decided to promote Gujarat tourism in big way, Gujarat was lesser known for tourism. People from out of Gujarat used to visit Dwarika, Ambaji, Somnath and Palitana temples. Who had imagined that dry desert can be also a great spot for tourism? It can be only visionary person like Narendrabhai who can imagine and develop Kutch desert as tourism place.

Actually Kutch was devastated after major earth quake of 2001. But due to BJP government’s pro active efforts and religious NGOs help Kutch was developed like never before. At this time, Narendra Modi was doing great work overall in Gujarat regarding road connectivity. And Kutch was also included. In 2005 Narendrabhai decided to host Rann Utsav. He knows importance of marketing and promoting. So his government promoted this festival in a big way. This festival provides glimpses of Kutch as well as Gujarat culture. Be it paintings or dance, dresses, handicraft things or any other culture programme hosted during the festival, everything echoes Gujarati culture.

Narendrabhai also ropped mega star Amitabh in to promoting Gujarat tourism. Well written slogans like Gujarat naheen dekha to kutch naheen dekha, Kuchh din to guzariye Gujarat mein and Khushboo Gujarat Kee, script,  locations, direction and presence of Amitabh Bachchan made ads very popular. It helped in promoting Gujarat tourism very well. Even seven years after this campaign, state still manages to hold on to impressive growth rates in tourist footfalls. It has accomplished a 16.94 per cent growth in tourist arrivals in FY17 over the previous year.

Moreover, Narendra Modi promoted Navratri festival in big way by hosting Vibrant Navratri programme since 2004. This programme projects not only Gujarati culture but national and international culture too. Many national and international stars come here for performing arts. This festival also helped to promote Gujarat tourism.

This year present chief minister Vijay Rupani government took it to next level by promoting ‘Selfie With Cow’! Seculars only love chicken and hate cows. Due to constant vicious propaganda, new generation also start to love chicken and hate cows. But in this Vibrant Navratri, four month old calf Saraswati was key attraction. Saraswati adorned in green Navratri dress wearing silver anklets and earings. BJP leader and chairman of state Gauseva Ayog and Gauchar Vikas Board Vallabh Kathiria said, “Selfie with Saraswati' is the cow board's initiative to attract youth towards cow and inculcate love and respect towards gaumata”.

International Kite festival is also big opportunity to attract not only national tourists but international tourists in a big way.

Efforts started by Narendrabhai way back in 2010 to get Ahmedabad declared as world heritage city saw result this year when UNESCO made this announcement. This will help to boost Gujarat tourism and Gujarat culture.

CM Vijaybhai Rupani also launched Seema Darshan programme at zero point of Nadabet border in Banaskantha district. It is a concept of border tourism which helps tourists to realize how our Jawans live and fight at border and boosts not only tourism but patriotism in our countrymen too. Exhibition of arms, border view, film about BSF, retreat of Jawans, BSF fusion band, camel show and bird show are main attractions of this border tourism. Added attraction is darshan of Nadeshwari Mata.

And now Gujarat Tourism Corporation has added a new tourism package! It is named ‘Modi tourism’! Tourists taking this package will get visit of Vadnagar and places around it. It is well known fact that Vadnagar is birth place of Narendra Modi. Gujarat can launch this type of tourism because Vadnagar is well developed during Modi government period and then afterwards Anandiben-Vijaybhai governments. Can there be Amethi or Raibareli tourism?

Today Sabarmati River front has become one of major tourist point. Before Narendra Modi took over as CM, Sabarmati used to be dry bed and youth used to play cricket there. But Modi government brought Narmada water into Sabarmati. And he also developed River front. Now there is water sports adventure in Sabarmati. Even, when Rahul Gandhi, vice president of Indian National Congress decided to hold Samvaad programme to raise unemployment and non development issues in Gujarat recently, he choose Sabarmati River front as location!

Last month Vijaybhai inaugurated lion safari park at Ambardi in Amreli district.  The park has been developed by carving out around 400 hectare or four square Km area out of Ambardi reserved forest.

Recently Gujarat tourism baged ‘Hall Of Fame’ award for being the Best State in comprehensive development of tourism category at the National Tourism Awards.

But there are more things that can be done to attract more tourists in Gujarat. There are many places that can be developed and promoted through advertise campaigns. Here are some:
1.       Kranti Teerth
Mandavi is a city based in Kachchh district. It has beautiful seashore. There is Vijay Vilas Palace which is historic. Many films like Hum Dil De Chuke Sanam are shot here. And more over there is Kranti Teerth a memorical of Shyamji Krushna Varma who was great freedom fighter. Nobody thought to bring back his ashes from Geneva but Narendrabhai and then birth place was developed as Kranti Teerth where one can know about freedom fighters. 

2.       Gopnath
Located 70 km away from Bhavnagar, the beach is on the Gulf of Khambat. It is rich in biodiversity and natural beauty. This beach is famous for the Gopinath Temple where famous Krushna Bhakta and ‘Adya Kavi’ Narsimha Mehta pleased Bhagwan Shiv. Shiv gave him Darshan. There are many beach places in this strip like Hathab, Kuda and Mahuva.

3.   Nishkalank Mahadev
Nishkalank Mahadev temple is located in Koliyak village at Bhavnagar District. This temple is unique in a way. Bhagvan Shiv here is well-known as Nishkalan Mahadev. There an idol of Shivjee was situated in an island, over the sea about 2 km to the east part of Koliyak village. That is very holly place. Sea itself performs Jalabhishek on Shiv Ling. It is said that Pandavs got all sins washed away here as they established Nishkalank Mahadev.

4.  Blackbuck National Park
 One remember well black buck as it is alleged that Salman Khan killed blackbuck in Rajasthan. But this blackbuck national park is situated in the Bhavnagar district. It was established in 1976. Population of the park mainly includes blackbucks, wolves, Macqueen's bustards, hyenas and lesser floricans, with foxes, jackals and jungle cats as the main carnivores. Other species include wild pigs, hares and rodents typical of the savannah type grasslands and thorn scrubs.

5.   Pirotan Island
Pirotan Island is an Arabian Sea island. It is known for Marine National Park, Jamnagar District of Gujarat state, India. It is located 12 nautical miles (22 km) off the coast (Bedi Port), consists of mangroves and low-tide beaches. Here tourist can see various marine life forms that include various types of Crabs,  Neptune, hermit crab, sea scorpion, wiper iscoceles, sea horse, octopus etc.